Monday, 31 August 2026

जनवरी की बरसात by musafir rishu

 जनवरी की बरसात



जनवरी की एक शाम थी।ठंड अपने पूरे शबाब पर थी। आसमान पर बादल थे और हवा में एक अजीब-सी नमी घुली हुई थी। शहर की सड़कें रोज की तरह भाग रही थीं, लेकिन उस शाम सब कुछ थोड़ा धीमा लग रहा था।फिर बारिश शुरू हो गई।जनवरी की बरसात वैसे भी अजीब होती है। न गर्मी से राहत देती है, न ठंड को कम करती है।बस चुपचाप आती है और अपने साथ बहुत सारी पुरानी यादें ले आती है।मैं सड़क किनारे एक चाय की दुकान के पास खड़ा बारिश देख रहा था।हाथ में चाय थी और आँखें सड़क पर।पता नहीं क्यों, उस बारिश ने मुझे कई साल पीछे पहुँचा दिया।

उस जनवरी में भी ऐसी ही बारिश हुई थी।और वह मेरे साथ थी।उस दिन हम दोनों कॉलेज से निकलकर घर जा रहे थे।ठंडी हवा चल रही थी। रास्ते में अचानक बूंदें गिरने लगीं।

मैंने कहा—“लगता है बारिश होने वाली है।”

वह मुस्कुराकर बोली—“तो होने दो।”“तुम्हारे पास छाता तो है नहीं।”उसने मेरी तरफ देखकर कहा—“तुम हो न।”उसके उस छोटे-से जवाब ने उस दिन मुझे जितना खुश किया था, शायद वह उसे कभी समझ ही नहीं पाई।हम एक ही छाते के नीचे चलने लगे।

छाता छोटा था।बारिश धीरे-धीरे तेज हो रही थी।मैं कोशिश कर रहा था कि पूरा छाता उसके ऊपर रहे और खुद बारिश में भीगता जा रहा था।

कुछ दूर चलने के बाद उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे अपनी तरफ खींच लिया।“इतना भीग क्यों रहे हो?”मैंने हँसकर कहा—“तुम्हें भीगने से बचा रहा हूँ।”

वह बोली—“पागल हो तुम।”मैंने कहा—“हाँ… 

वह कुछ नहीं बोली।बस मुस्कुराती रही।और शायद उस दिन बारिश से ज्यादा खूबसूरत उसकी वह मुस्कान थी।हमारा प्यार बहुत बड़ा नहीं था।न महंगे तोहफे थे।न बड़ी-बड़ी डेट।न रोज मिलने का मौका।हमारी मोहब्बत तो बस इतनी थी कि—वह पूछ लेती थी, “खाना खाया?”मैं कह देता था, “घर पहुँचकर फोन करना।”

वह नाराज़ होती तो मैं उसे मनाने के लिए बेवजह की बातें करता।

और जब मैं परेशान होता, तो वह सिर्फ इतना कहती—

“सब ठीक हो जाएगा… मैं हूँ न।”शायद प्यार यही होता है।किसी का जिंदगी में होना…और उसके होने से जिंदगी थोड़ी आसान लगने लगना।

किन जिंदगी हर कहानी को उसकी मर्जी से नहीं चलने देती।धीरे-धीरे हमारे बीच दूरियाँ आने लगीं।पहले बातें घंटों होती थीं।

फिर मिनटों में होने लगीं फिर कभी-कभी।

और एक दिन…बिल्कुल बंद।कोई बड़ा झगड़ा नहीं हुआ था।बस छोटी-छोटी गलतफहमियाँ जमा होती गईं।मैंने उसकी खामोशी को बेरुखी समझ लिया।उसने मेरी व्यस्तता को दूरी समझ लिया।दोनों के पास कहने को बहुत कुछ था…लेकिन दोनों इंतजार करते रहे कि पहले सामने वाला बोले।और इसी इंतजार में एक खूबसूरत रिश्ता धीरे-धीरे चुप हो गया।

कई महीने गुजर गए।

मैंने खुद को समझा लिया कि शायद हमारा साथ इतना ही था।लेकिन कुछ रिश्ते खत्म होने के बाद भी खत्म नहीं होते।वे हमारे अंदर कहीं चुपचाप रह जाते हैं।किसी गाने में।किसी सड़क परकिसी खुशबू में। या फिर…

जनवरी की बरसात में।


 

उस शाम मैं चाय की दुकान पर खड़ा था।बारिश तेज हो चुकी थी।मैंने चाय खत्म की और घर जाने के लिए मुड़ा।

तभी सामने से एक लड़की छाता लेकर आती दिखाई दी।कुछ कदम बाद मेरा दिल अचानक रुक-सा गया।वह वही थी।वही आँखें।वही मुस्कान।बस इस बार उसके बालों में पहले से ज्यादा बारिश थी और आँखों में शायद कुछ ज्यादा कहानी।हम दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे।फिर उसने धीरे से पूछा—

“अब भी बारिश में भीगते हो?”मैं मुस्कुरा दिया।“अब कोई छाता लेकर चलने वाला नहीं है।”वह कुछ पल चुप रही फिर छाता मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोली—“तो आज फिर साथ चलो।”

मैंने उसकी तरफ देखा।

इतने सालों से जिस जवाब का इंतजार था, वह शायद उस एक वाक्य में मिल गया था।हम दोनों एक ही छाते के नीचे चलने लगे।

बारिश वही थी।ठंड वही थी।

सड़क वही थी।लेकिन इस बार हमारे बीच की खामोशी नहीं थी।रास्ते में उसने धीरे से कहा—“तुमने कभी फोन क्यों नहीं किया?”

मैंने कहा—“मुझे लगा तुम बात नहीं करना चाहती।”

वह हँसी। आँखों में नमी थी।“और मुझे लगा तुम्हें फर्क नहीं पड़ता।”मैंने कुछ नहीं कहा।क्योंकि कुछ रिश्तों में सबसे बड़ी गलती प्यार की कमी नहीं होती…बात न करने की होती है।हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे।बस दोनों अपने-अपने अहंकार और गलतफहमियों के पीछे छिपे हुए थे।उस रात हम बहुत देर तक बातें करते रहे।पुरानी शिकायतें भी हुईं।

आँसू भी आए।कुछ हँसी भी।और आखिर में उसने पूछा—

“अब?”मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा—“अब अगर जिंदगी ने फिर कभी दूर किया, तो इस बार हम खामोश नहीं रहेंगे।”

वह मुस्कुराई।“पक्का?”मैंने कहा—“जनवरी की इस बरसात की कसम।”वह हँस पड़ी।और उस हँसी में मुझे लगा जैसे कई सालों से बंद पड़ा कोई दरवाजा फिर खुल गया हो।

आज कई साल बाद भी जब जनवरी में बारिश होती है…मुझे वह शाम याद आती है।वह छोटा-सा छाता।ठंडी हवा।गरम चाय।भीगी हुई सड़क। और वह लड़की…

जिसने मुझे एक बात सिखाई—प्यार सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं है।प्यार उस इंसान को समझने की कोशिश करने का नाम है।उसकी खामोशी को सुनने का नाम है।गलती होने पर झुक जाने का नाम है।

और सबसे जरूरी…दूरी आ जाने के बाद भी रिश्ते को बचाने की कोशिश करने का नाम है।क्योंकि हर रिश्ते में बारिश आएगी।कभी गलतफहमी की।कभी मजबूरी की।कभी हालात की।लेकिन अगर दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़े रहें…तो बारिश कितनी भी तेज क्यों न हो,रास्ता फिर भी खूबसूरत लगने लगता है।और शायद इसीलिए…मुझे जनवरी की बरसात आज भी पसंद है।

क्योंकि मेरे लिए वह सिर्फ बारिश नहीं है।वह एक याद है।एक मुलाकात है।एक अधूरी कहानी का पूरा होना है।और उस प्यार की गवाही है…जो कभी खत्म नहीं हुआ था।बस कुछ समय के लिए

खामोश हो गया था।कुछ लोग मौसम की तरह आते हैं…और कुछ लोग मौसम बदल जाने के बाद भी हमारे साथ रहते हैं।

जनवरी की बरसात उन्हीं लोगों की याद है। ❤️

                       मुसाफिर रिशु
                        Musafir rishu

Sunday, 30 August 2026

सर्दियों की धूप

 सर्दियों में धूप




सर्दियों की सुबह भी अजीब होती है।

रात कितनी भी लंबी क्यों न लगे, सुबह होते ही खिड़की के पर्दे के पीछे से आती हल्की-सी रोशनी मन को बता देती है कि दिन शुरू हो चुका है।

लेकिन सर्दियों की सुबह में जल्दी कौन उठना चाहता है?

रजाई के अंदर की गर्माहट छोड़कर बाहर निकलने का मन ही नहीं करता। अलार्म बजता है, हम उसे बंद करते हैं और खुद से कहते हैं—“बस पाँच मिनट और…”


और वही पाँच मिनट कब आधा घंटा बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता।

फिर किसी की आवाज आती है—


“उठो बेटा… धूप निकल आई है।”


बस यही आवाज सर्दियों की सुबह को पूरा कर देती है।उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ था।

मैं काफी देर तक रजाई में पड़ा रहा। बाहर कोहरा था। पेड़ों की पत्तियाँ बिल्कुल शांत थीं और छत पर रखी बाल्टी का पानी इतना ठंडा था कि उसे देखकर ही हाथ पीछे खींच लेने का मन कर रहा था।

आखिरकार मैं उठा और बाहर आ गया।

आँगन में एक पुरानी चारपाई पड़ी थी। उसके पास दादी बैठी थीं। सिर पर ऊनी शॉल, हाथ में चाय का कप और चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान।

मैं उनके पास जाकर बैठ गया।

दादी ने बिना कुछ पूछे मेरे हाथ में चाय का कप पकड़ा दिया।

मैंने चाय की एक चुस्की ली।

गरम चाय और ठंडी हवा के बीच का वह एहसास… शायद सर्दियों की सबसे खूबसूरत चीजों में से एक है।

थोड़ी देर बाद सूरज की किरणें दीवार के ऊपर से झाँकने लगीं।



दादी चारपाई को धीरे-धीरे धूप की तरफ खिसकाने लगीं।

मैंने हँसते हुए पूछा—

“दादी, धूप भी कहीं जाती है क्या?”

उन्होंने मेरी तरफ देखा और बोलीं—

“धूप कहीं नहीं जाती बेटा… बस हमें उसकी कीमत समझने में देर लग जाती है।”

मैं चुप हो गया।

उस स वक्त शायद उनकी बात समझ नहीं आई थी।

लेकिन आज समझ आता है--

सर्दियों में धूप सिर्फ शरीर को गर्म नहीं करती।

वह मन को भी गर्म करती है।

गाँव के आँगन में बैठकर धूप सेंकते हुए पता ही नहीं चलता कि कब घंटों बीत गए।

कोई मूँगफली लेकर बैठा है।

कोई सरसों के खेतों की बात कर रहा है।

बच्चे धूप में खेल रहे हैं।कहीं दूर से चूल्हे के धुएँ की खुशबू आ रही है।और घर के किसी कोने से आवाज आती है—

“चाय बन गई है।”


फिर लगता है…शायद जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए बहुत बड़ी चीजों की जरूरत नहीं होती।

कभी-कभी एक चारपाई,एक कप चाय,कुछ अपने लोग और थोड़ी-सी धूप ही काफी होती है।---

शहरों में सर्दियाँ शायद थोड़ी अलग होती हैं।

यहाँ धूप निकलती भी है तो लोग उसे खिड़की के शीशे के पीछे से देखते हैं।

सुबह जल्दी ऑफिस जाना होता है।

ट्रैफिक में फँसना होता है।

मोबाइल पर लगातार नोटिफिकेशन आते रहते हैं।

दिन गुजर जाता है…

और हमें पता ही नहीं चलता कि आज सूरज निकला था या नहीं।

लेकिन गाँव में धूप का इंतजार किया जाता है।

लोग जानते हैं कि कब आँगन का कौन-सा हिस्सा धूप में आएगा।

किस दीवार के पास बैठने से ज्यादा गर्मी मिलेगी।

किस पेड़ के नीचे बैठकर दोपहर सबसे अच्छी लगेगी।और शायद इसी वजह से गाँव के लोगों के पास समय कम होने के बावजूद सुकून थोड़ा ज्यादा होता है।

उस दिन दादी के साथ बैठे-बैठे मैंने उनसे पूछा—“आपको सर्दियाँ इतनी पसंद क्यों हैं?”उन्होंने सामने खेतों की तरफ देखते हुए कहा—“क्योंकि सर्दियों में धूप की जरूरत समझ आती है।”मैं उनकी तरफ देखने लगा।

उन्होंने आगे कहा—

“गर्मी में धूप परेशान करती है, लेकिन ठंड में वही धूप इंतजार करवाती है। जिंदगी भी ऐसी ही है… जब सब ठीक चल रहा होता है तो छोटी-छोटी खुशियाँ दिखाई नहीं देतीं। लेकिन जब जिंदगी थोड़ी ठंडी पड़ती है न… तब किसी का साथ, किसी की बात और किसी की छोटी-सी मुस्कान भी धूप जैसी लगती है।”

उनकी बात सुनकर मैं कुछ देर तक कुछ बोल नहीं पाया।शायद हम बड़े होते-होते यही भूल जाते हैं।हम बड़ी खुशियों के पीछे भागते रहते हैं और छोटी खुशियों को रास्ते में छोड़ देते हैं।हमें लगता है कि खुश होने के लिए कुछ बड़ा होना चाहिए।जबकि कभी-कभी खुशी बस इतनी होती है कि कोई बिना पूछे चाय बना दे।

कोई कह दे—

“ठंड लग रही होगी, स्वेटर पहन लो।”कोई दूर रहते हुए फोन करके पूछ ले—

“खाना खाया?”और कभी…

कोई हमारे पास चुपचाप बैठा रहे बिना कुछ कहे।दोपहर तक धूप पूरे आँगन में फैल चुकी थी।

दादी चारपाई पर लेट गईं।

मैं पास ही बैठकर मोबाइल देखने लगा।फिर अचानक मेरी नजर उनके चेहरे पर पड़ी।उनकी आँखें बंद थीं।

चेहरे पर धूप पड़ रही थी और होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी।

मैंने मोबाइल नीचे रख दिया। उस पल लगा…

कुछ पल कैमरे में कैद करने के लिए नहीं होते, उन्हें बस जी लेना चाहिए।

मैं भी चारपाई पर बैठ गया।कुछ देर तक कोई बात नहीं हुई।

सिर्फ धूप थी।ठंडी हवा थी।

और हमारे बीच एक खामोशी थी, जो किसी बातचीत से कम खूबसूरत नहीं थी। शाम होने लगी।

सूरज धीरे-धीरे नीचे उतर रहा था।आँगन से धूप खिसककर दीवार तक पहुँच गई थी।मैं उठने लगा तो दादी ने कहा—

“कल फिर धूप में बैठना।”

मैंने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, कल बैठेंगे।”

लेकिन जिंदगी में “कल” हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता।

कुछ लोग अगले दिन हमारे साथ होते हैं।

कुछ नहीं होते।कुछ आँगन वैसे ही रहते हैं।कुछ आँगन हमेशा के लिए याद बन जाते हैं।

और कुछ सर्दियों की धूप…हर साल लौटकर आती है, लेकिन उसके साथ बैठने वाले लोग वही नहीं रहते।शायद इसलिए सर्दियों की धूप सिर्फ गर्म नहीं होती…वह हमें याद भी दिलाती है।उन लोगों की याद,जिनके साथ बैठकर हमने कभी समय की कीमत नहीं समझी।

उन दिनों की याद,

जब हमारे पास कम था लेकिन खुशियाँ ज्यादा थीं।

उस घर की याद,जहाँ कोई हमारा इंतजार करता था।और उन पलों की याद…जिन्हें हम उस वक्त साधारण समझते थे, लेकिन आज वही हमारी सबसे खूबसूरत यादें हैं।

आज भी जब सर्दियों में धूप निकलती है, मैं कुछ देर उसके पास बैठ जाता हूँ। कभी चाय लेकर। कभी बिना चाय के।

कभी अकेला। और कभी पुरानी यादों के साथ।

अब समझ आया है कि दादी सही कहती थीं—धूप कहीं नहीं जाती।

बस कभी-कभी हमारी जिंदगी इतनी भागने लगती है कि हम उसके पास बैठना भूल जाते हैं। इसलिए जब अगली बार सर्दियों की धूप आपके आँगन में उतरे…तो थोड़ी देर रुकिएगा। मोबाइल एक तरफ रख दीजिए। किसी अपने के पास बैठिए।

एक कप चाय पीजिए। और उस पल को महसूस कीजिए।

क्योंकि हो सकता है…आज की यही साधारण-सी दोपहर,

कुछ साल बाद आपकी जिंदगी की

सबसे खूबसूरत याद बन जाए।

क्योंकि सर्दियों की धूप सिर्फ शरीर को गर्म नहीं करती…

कुछ धूपें मन के उन कोनों तक भी पहुँचती हैं, जहाँ बहुत समय से ठंड जमी होती है।

मुसाफिर रिशु
Musafirrishu.blogspot.com 


Thursday, 27 August 2026

पहाड़ों पर चाय भाग 2 by musafir rishu

 सौरभ ने फोन हमारी तरफ बढ़ाते हुए बस इतना कहा—

“भाई... हमें यहाँ से अभी निकलना होगा।”

हम सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

मैंने जल्दी से फोन छीनना चाहा लेकिन शिवम ने मुझसे पहले ही फोन ले लिया उसने बिना कुछ कहे फोन को कान पर लगाया और थोड़ी दूर चला गया | 

 हम सबने एक दूसरे को देखा सब उदास हो गए, मैंने सोचा लगता है सफर यही तक का था हमने अभी पहाड़ों पर चाय भी नहीं पी थी पर थोड़ा सुकून था कि हमने बाबा जी की 60 साल के अनुभव वाली चाय पी थी | पर अब लगता है 10 दिन का यह सफर आज ही खत्म होगा और हमे वापस लखनऊ जाना पड़ेगा यही से मैं यह सोच कर दुखी हो रहा था तभी सौरभ हंसने लगा और शिवम भी हंसते हुए हमे चिढ़ाने लगा 

सौरभ ने फोन जेब में रखा और वापस हमारी तरफ आकर बैठ गया। हम सबकी नजरें उसी पर थीं।

“अब बता भी दे भाई, किसका फोन था?” शिव ने बेसब्री से पूछा।

सौरभ मुस्कुराया और बोला, “मेरे एक पुराने दोस्त का था, जो यहीं उत्तराखंड में रहता है।”

“तो इसमें इतना सस्पेंस्य क्या है?” मैंने हँसते हुए कहा।

सौरभ ने सामने पहाड़ों की तरफ देखा और बोला,

“उसने ऐसी जगह के बारे में बताया है जहाँ शायद हममें से कोई पहले कभी नहीं गया।”

हम सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

शिव ने तुरंत अपना बैग उठाया—

“चलो फिर, चाय बाद में पी लेंगे।”

हम हँस पड़े।

कुछ ही देर में हम अपना सामान लेकर उस अनजान रास्ते पर निकल पड़े। सड़क धीरे-धीरे संकरी होती जा रही थी और मोबाइल का नेटवर्क भी गायब होने लगा था।

शहर की ऊँची इमारतों की जगह अब सिर्फ पहाड़ थे।

और तभी मुझे एहसास हुआ—

हम सिर्फ घूमने नहीं आए थे… शायद ये सफर हमें कुछ ऐसा देने वाला था, जिसे हम जिंदगी भर याद रखने वाले थे रास्ते पर चलते हुए सौरभ बार-बार रास्ते की फोटो लेने के  लिए फोन निकाल लेता  और शिवम उसे चिढ़ाते हुए कहता—


“भाई, फोटो ही खींचता रहेगा या पहाड़ भी देखेगा?”


मैं चुपचाप बाहर देख रहा था। हवा में मिट्टी और देवदार के पेड़ों की खुशबू थी। शहर में जिस शोर से हम भागकर आए थे, यहाँ उसकी जगह सिर्फ हवा की आवाज और कभी-कभी किसी पक्षी की आवाज सुनाई दे रही थी।


कुछ दूर जाने के बाद सड़क खत्म जैसी हो गई। आगे सिर्फ पत्थरों और मिट्टी का रास्ता था।


हमने अपना सामान उठाया और पैदल चलना शुरू कर दिया।


पहले तो सब बड़े जोश में थे, लेकिन लगभग आधे घंटे बाद शिवम बोला—


“भाई, जिस जगह के लिए आए हैं वो यहीं है या ऊपर भगवान के घर तक जाना है?”


सब जोर से हँस पड़े।


चलते-चलते अचानक पेड़ों के बीच से एक छोटा-सा खुला मैदान दिखाई दिया।


और उसके सामने...


पहाड़ों का ऐसा नज़ारा था कि हम सब वहीं रुक गए।


दूर-दूर तक पहाड़ ही पहाड़ थे। कुछ पहाड़ों पर बादल ऐसे बैठे थे जैसे किसी ने उन्हें सफेद चादर से ढक दिया हो। नीचे एक छोटी-सी नदी दिखाई दे रही थी और उसके किनारे कुछ घर।


कुछ सेकंड के लिए कोई कुछ नहीं बोला।


फिर सौरभ ने धीरे से कहा—


“यार... इतनी खूबसूरत जगह भी होती है?”


मैंने मुस्कुराकर कहा—


“इसीलिए तो आया हूँ।”


हमने अपना सामान एक तरफ रखा और वहीं बैठ गए।


किसी ने फोन निकालकर गाने चला दिए। कोई फोटो लेने लगा और शिवम हमेशा की तरह सबकी फोटो खराब करने में लगा हुआ था।


हमने खूब मस्ती की। कभी एक-दूसरे को धक्का देते, कभी पुराने कॉलेज के किस्से याद करके हँसते और कभी बिना किसी वजह के बस पहाड़ों को देखते रहते।


शाम होने लगी थी।


ठंडी हवा अब और तेज हो गई थी।


तभी  पास एक छोटी-सी दुकान दिखाई दी। दुकान बहुत साधारण थी—लकड़ी की एक छोटी-सी छत, सामने कुछ बिस्कुट के पैकेट और एक चूल्हे पर चाय चढ़ी हुई थी।


मैंने मन मे सोचा रोज बाबा इतनी ऊँची पहाड़ी चढ़ कर चाय बनाने आते हैं!


फिर कुछ देर बाद पता चला बाबा इसी पहाड़ी पर रहते है उनका घर यही पहाड़ी पर है और वो और उनकी पत्नी साथ रहते हैं 


बाबा ने बताया दूसरी तरफ एक रास्ता है जिससे पहाड़ चढ़ना आधे घंटे का काम है बस हम एक दूसरे को देख कर हसने लगे 


बाबा चूल्हे पर चाय बना रहे थे।


शिव ने पूछा—


“बाबा, पाँच चाय मिल जाएंगी?”


बाबा मुस्कुराए और बोले—


“चाय तो मिल जाएगी बेटा, लेकिन पहाड़ की चाय पीने के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा।”


हम सब बैठ गए।


कुछ देर बाद बाबा ने हमें चाय दी।


मैंने पहला घूंट लिया और कुछ पल के लिए आँखें बंद कर लीं।


सच कहूँ तो वह चाय सिर्फ चाय नहीं थी।


उसमें पहाड़ की ठंडक थी, सफर की थकान थी और शायद उन दस दिनों की शुरुआत भी थी जिनका हम इतने दिनों से इंतजार कर रहे थे।


मैंने हँसते हुए कहा—


“भाई, ट्रिप का नाम सही रखा था मैंने— पहाड़ों  पर चाय।”


सब हँस पड़े।


उसी समय मेरी नजर सामने पहाड़ों की तरफ गई।


सूरज धीरे-धीरे पहाड़ों के पीछे छिप रहा था और आसमान का रंग सुनहरा हो गया था।


मैं चुपचाप वही देख रहा था कि तभी मेरे पास एक आवाज आई—


“सुंदर है ना?”


मैंने पीछे मुड़कर देखा।


एक लड़की थी जिसे हमने रास्ते में देखा था।


मैंने मुस्कुराकर कहा—


“बहुत... शायद शब्दों में नहीं बता पाऊँगा।”


वह भी मुस्कुरा दी।


“पहाड़ों की खूबसूरती बताई नहीं जाती, बस महसूस की जाती है।”


उसकी यह बात मेरे मन में कहीं रह गई।


हम दोनों कुछ देर चुप रहे।


फिर उसने पूछा—


“आप लोग पहली बार आए हो?”


मैंने कहा—


“हाँ, और शायद पहली बार किसी जगह से इतनी जल्दी प्यार हुआ है।”


वह हँस दी।


मैं भी मुस्कुरा दिया।


कुछ मुलाकातें बहुत छोटी होती हैं, लेकिन पता नहीं क्यों उनकी याद बहुत लंबी हो जाती है।


शिवम दूर से हमें देख रहा था। उसने सौरभ के कान में कुछ कहा और दोनों हँसने लगे।


मैंने उन्हें घूरकर देखा तो शिवम चिल्लाया—


“अरे भाई, पहाड़ देखने आए थे... पहाड़न देखने नहीं!”


सब हँसने लगे और मैं शर्माकर दूसरी तरफ देखने लगा।


रात होने लगी थी।


हमने बाबा को चाय के पैसे दिए वो 


कहने लगे—


“पहाड़ पर आए हो बेटा, याद लेकर जाना है।”


उनकी बात सुनकर हम कुछ पल चुप रहे।


फिर हमने बाबा के साथ एक फोटो ली और आगे बढ़ गए।


रास्ते में शिवम फिर शुरू हो गया—


“तो भाई, दस दिन का सफर है... पहले दिन ही कोई मिल गई?”


मैंने कहा—


“कुछ भी बोलता है तू।”


सौरभ हँसते हुए बोला—


“भाई, पहाड़ पर चाय तो पी ली... अब कहानी आगे बढ़ेगी।”


हम सब हँसते हुए आगे बढ़ते रहे।


उस रात हम एक छोटे-से पहाड़ी घर में रुके। बाहर ठंडी हवा चल रही थी और आसमान में इतने तारे थे जितने शायद मैंने शहर में कभी देखे ही नहीं थे।


सब दोस्त बातें करते-करते सो गए।


लेकिन मैं काफी देर तक खिड़की के पास बैठा रहा।


मेरे हाथ में वही पहाड़ी चाय का आखिरी कप था।जो इस बार मैंने खुद बनाई  थी 

मैं सोच रहा था कि हम यहाँ सिर्फ दस दिन की छुट्टी बिताने आए थे।

लेकिन उस सफर ने पहले ही दिन मुझे कुछ सिखा दिया था—

जिंदगी हमेशा बड़ी खुशियों से खूबसूरत नहीं होती। कभी-कभी दोस्तों के साथ एक अनजान रास्ता, पहाड़ों के बीच एक छोटी-सी दुकान और हाथ में चाय का कप ही काफी होता है।


और शायद प्यार भी कुछ ऐसा ही है।


वो हमेशा किसी बड़ी कहानी के साथ नहीं आता।


कभी-कभी वो बस एक अनजान रास्ते पर हुई छोटी-सी मुलाकात, एक हल्की-सी मुस्कान और कुछ अधूरे शब्दों के रूप में जिंदगी में आ जाता है।


मैंने खिड़की से बाहर देखा।

दूर पहाड़ चाँदनी में बिल्कुल शांत खड़े थे।

मैं मुस्कुराया और मन ही मन कहा—

“हम तो पहाड़ों पर चाय पीने आए थे... लेकिन लगता है ये सफर हमारे दिल में कुछ और भी छोड़ जाएगा।”

फिर मैंने चाय का आखिरी घूंट लिया, खिड़की बंद की और सोने चला गया।सफर खत्म हो चुका था... लेकिन शायद एक नई कहानी शुरू हो गई थी।

जो लखनऊ में भी मुझे याद थी वो एक बात 

"सुन्दर है ना........


— समाप्त — ☕🏔️❤️

 मुसाफिर रिशु

Musafir rishu 

Wednesday, 26 August 2026

पहाड़ों पर चाय by musafir rishu

पहाड़ों पर चाय 

आज का दिन थोड़ा सुकून से भरा था, किसी भी नौकरी पेशा इंसान की जिंदगी का सबसे खूबसूरत दिन छुट्टियों का होता है 
और हमे नहीं पता था कि अगला दस दिन हमारी जिंदगी में इतना यादगार होगा 
जब वह अपनी भाग दौड़ की जिंदगी में कुछ समय अपने लिए निकालता है, मेरे लिए तो यह पूरे दस दिन का समय था |और हमे नहीं पता था कि अगला दस दिन हमारी जिंदगी में इतना यादगार होगा 
इतने में कुछ पुराने दोस्तों के फोन आ गए सब ग्रुप कॉल पर थे शिव ने कहा " अबे ऐसे ही मरना है या जिंदगी भी जियेंगे " सब सोचने लगे बात सही है कुछ खामोशी के बाद सबने पहाड़ों की ओर चलने का सोचा और इस ट्रिप का नाम मैंने दिया "पहाड़ों पर चाय"
नाम सुनकर सब हँसे, लेकिन मुझे नहीं पता था कि आने वाले दिनों में यही नाम हमारे सफर की सबसे खूबसूरत याद बन जाएगा।

सोमवार को हम सबको लखनऊ स्टेशन पर मिलना था।
समय था सुबह 8:30 बजे।
टिकटों की जिम्मेदारी शिवम ने ले ली थी। उसने सबके टिकट निकाल दिए और हमने अपने-अपने पैसे उसे भेज दिए।
मैं और सौरभ साथ में निकले।
हम दोनों के घरों के बीच सिर्फ तीन कॉलोनियों का अंतर था, लेकिन जिंदगी की व्यस्तता ऐसी थी कि कई-कई महीने मुलाकात नहीं हो पाती थी।
उस दिन हम दोनों एक ही ऑटो में बैठे थे।
सौरभ ने रास्ते में पूछा—
“भाई, सच में दस दिन निकाल पाएंगे?”
मैंने हँसकर कहा—
“नौकरी वापस आकर भी कर लेंगे, पहले जिंदगी जी लेते हैं।”
शायद उस समय हम दोनों को अंदाजा नहीं था कि ये बात आगे चलकर कितनी सही साबित होने वाली है।
हम करीब 8 बजे स्टेशन पहुँच गए।
स्टेशन पर हमेशा की तरह भीड़ थी। कोई जल्दी में था, कोई अपने परिवार को विदा कर रहा था और कोई हाथ में चाय लेकर ट्रेन का इंतजार कर रहा था।
लेकिन हमारे ग्रुप का कोई और सदस्य दिखाई नहीं दे रहा था।
पाँच दोस्तों में सिर्फ हम दो थे।
तभी शिव का फोन आया—
“यार, मुझे थोड़ी देर हो जाएगी।”
हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
सौरभ बोला—
“टिकट तो इसके पास हैं!”
अब हमारी चिंता बढ़ गई।
लेकिन कुछ ही देर बाद वही शिव सबसे पहले स्टेशन पर दिखाई दिया।
हमने उसे देखते ही कहा—
“भाई, तेरी वजह से हमारी तो जान निकल गई थी!”
वह हँसते हुए बोला—
“अरे, अभी तो सफर शुरू हुआ है।”
धीरे-धीरे बाकी दोस्त भी आ गए।
कुछ देर बाद हमारी ट्रेन भी प्लेटफॉर्म पर आ गई।
और फिर...
हम सब अपनी सीटों पर बैठ गए।
ट्रेन धीरे-धीरे स्टेशन से बाहर निकलने लगी।
मैं खिड़की के पास बैठा बाहर देख रहा था।
शहर पीछे छूट रहा था।
सामने सिर्फ रास्ता था।
और हमारे पास पूरे दस दिन।
🌙 ट्रेन की रात
कुछ घंटे तक बातें, हँसी-मजाक और पुराने किस्से चलते रहे।
फिर रात हो गई।
सबने अपने-अपने टिफिन निकाल लिए।
किसी के घर की पूरी-सब्जी थी, किसी के पास पराठे थे और किसी ने रास्ते के लिए जरूरत से ज्यादा खाना पैक कर लिया था।
हमने खाना खाया और फिर धीरे-धीरे डिब्बे में शांति होने लगी।
बाहर अंधेरा था।
ट्रेन अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी।
पता नहीं कब मेरी आँख लग गई।
🏔️ सुबह...
जब मेरी आँख खुली तो मैंने खिड़की के बाहर देखा।
कुछ पल के लिए मुझे समझ ही नहीं आया कि हम कहाँ पहुँच गए हैं।
फिर सामने पहाड़ दिखाई दिए।
उत्तराखंड।
मैं कुछ सेकंड तक चुपचाप खिड़की से बाहर देखता रहा।
शायद बाकी दोस्तों की नींद अभी पूरी नहीं हुई थी, लेकिन मेरी नींद पूरी हो चुकी थी।
क्योंकि जिस चीज के लिए हम निकले थे...
वो हमारे सामने थी।
पहाड़।
ठंडी हवा।
अनजान रास्ते।
और एक लंबा सफर।
मैंने दोस्तों को उठाया और कहा—
“उठो भाई... पहाड़ आ गए।”
सब खिड़की की तरफ देखने लगे।
किसी के चेहरे पर नींद थी, किसी के चेहरे पर उत्सुकता 
और मेरे मन में सिर्फ एक बात थी—
“अब असली सफर शुरू हुआ है।” सब अपना सामान ले कर नीचे उतरे और स्टेशन पर चाय पीना तय हुआ तभी सौरभ जो खाने का सबसे ज्यादा शौकीन था उसने कहा " नहीं यार यहां नहीं अब हम उत्तराखंड में हैं तो थोड़ी शांत जगह चाय पीते हैं |
मुझे बात काफी पसंद आयी क्योंकि स्टेशन पर बहुत भीड़ थी जैसे मानो पूरा उत्तराखंड कहीं जा रहा हो फिर सबने ऑटो किया और एक सुनसान सड़क पर रुके जहां एक लंबी सड़क थी जो लोगों को उनकी मंजिल तक ले जाती जैसे हमसे पूछ रही हो "क्या तुम्हें भी कहीं जाने की जल्दी है " मैनें में मुस्कराते हुए लंबी साँस ली देखा तो सब मुझसे कुछ आगे निकल गए थे मैं मस्ती में चलने लगा ऊंचे ऊंचे पहाड़ मेरे जिंदगी की थकान मानो अपने में समेट ले गए कुछ दूर चले तभी उस सुनसान सड़क पर हमे एक चाय की टपरी दिखी हमे लगा जैसे किसी प्रेमी को उसकी बरसों की बिछडी प्रेमिका मिल गयी हो सौरभ खुशी से नाचने लगा मैंने भी उसके साथ मस्ती में कदम से कदम मिलाया और सब हंसते हुए टपरी पर आ गए 
टपरी पुरानी थी एक बाबा चाय उबाल रहे थे चाय की खुशबू ने सबको मोहित किया और सबके लिए शिवम ने चाय बोल दी बाबा जी ने बताया कि वे जब 17 साल के थे तबसे इस टपरी पर चाय बना रहे हैं आज उनकी उम्र करीब 60 से कुछ ज्यादा ही होगी हमने विषमय से बाबा जी को देखा और सोचा कोई एक ही जगह पर इतने दिनों तक कैसे काम कर सकता है 
तब तक चाय टेबल पर आ गयी होने चाय पी चाय मे बाबा जी के 60 सालों का अनुभव और सुकून था ऐसी चाय सायद ही कभी पी हो 
पर ये अभी वह चाय नहीं थी जिसे पीने हम लखनऊ से उत्तराखंड आए थे 
अचानक सौरभ का फोन बजा उसने फोन उठाया और कुछ सेकंड तक बिना कुछ बोले सुनता रहा। उसके चेहरे का रंग अचानक बदल गया।
हमने पूछा—“क्या हुआ?”
सौरभ ने फोन हमारी तरफ बढ़ाते हुए बस इतना कहा—
“भाई... हमें यहाँ से अभी निकलना होगा।”
हम सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
आखिर ऐसा क्या हुआ था कि जिस सफर के लिए हम इतने उत्साहित होकर निकले थे, उसी के बीच हमें वापस जाने की बात करनी पड़ रही थी?
जानेंगे “पहाड़ी पर चाय — भाग 2” में। ☕🏔️

                                                                 लेखक 
                                                              मुसाफिर रिशु
                                                           Musafir rishu




Saturday, 1 August 2026

वह आखिरी खत by musafir rishu

 वह आखिरी ख़त




डाकिया उस दिन कुछ देर से आया था।सर्दियों की दोपहर ढलने लगी थी। गाँव की कच्ची गलियों पर धूप अब पेड़ों की छाया में सिमटने लगी थी। दूर खेतों से लौटती गायों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं और पुराने बरगद के नीचे बैठे बूढ़े लोग रोज की तरह दुनिया भर की खबरों पर बहस कर रहे थे। मैं आँगन में बैठा चाय पी रहा था। तभी दरवाजे पर आवाज आई—

“राघव! चिट्ठी है तुम्हारे नाम।”मैंने पलटकर देखा।डाकिया हाथ में एक पुराना-सा लिफाफा लिए खड़ा था।लिफाफे पर मेरा नाम लिखा था।लेकिन लिखावट…मैं उसे देखते ही पहचान गया।मेरे हाथ से चाय का कप लगभग छूट गया।वह लिखावट मीरा की थी।

मीरा…

जिसे गुजरे हुए पूरे सात साल हो चुके थे।मैंने लिफाफा हाथ में लिया। कागज पुराना था। किनारे हल्के पीले पड़ चुके थे।

ऊपर सिर्फ इतना लिखा था—“राघव के लिए… जब वह मुझे भूलने लगे।”मेरी उंगलियाँ काँपने लगीं।सात साल पहले मीरा ने मुझे आखिरी बार कहा था—“अगर कभी तुम्हें मेरी याद आए, तो मुझे ढूँढने मत आना।”मैंने उस दिन उसकी बात मान ली थी।

लेकिन इंसान किसी को भूलने का फैसला तो कर सकता है…

दिल को आदेश नहीं दे सकता। मैंने शादी नहीं की।

लोगों ने बहुत पूछा। माँ ने भी। रिश्तेदारों ने भी।

मैं हर बार हँसकर टाल देता।

कह देता—“अभी जिंदगी में बहुत काम है।”

लेकिन सच यह था कि जिंदगी में काम बहुत था…बस मीरा नहीं थी। मैंने लिफाफा खोला। अंदर चार पन्ने थे। पहली लाइन पढ़ते ही मेरी साँस जैसे रुक गई—«“राघव, अगर यह ख़त तुम्हारे हाथ में है, तो शायद मैं तुम्हारे सामने नहीं हूँ।”»

मैंने आगे पढ़ना शुरू किया। “तुम मुझसे हमेशा पूछते थे कि उस आखिरी शाम मैं तुमसे बिना मिले क्यों चली गई थी। आज तुम्हें सच बताने का समय आ गया है।” मेरी आँखें कागज पर थीं।

लेकिन सात साल पुरानी एक शाम मेरे सामने फिर से जीवित हो गई। वह जुलाई की शाम थी। बारिश हो रही थी। हम दोनों गाँव के बाहर वाली पगडंडी पर मिले थे। मीरा बहुत परेशान थी।

मैंने पूछा था— “क्या हुआ?”उसने कहा—

“कुछ नहीं।” मैं हँस पड़ा था।

“तुम्हारे ‘कुछ नहीं’ का मतलब हमेशा कुछ बहुत बड़ा होता है।”

उस दिन उसने मेरी तरफ देखा तक नहीं। बस मिट्टी में पड़े एक पत्थर को पैर से हटाती रही। फिर अचानक बोली—

“राघव, अगर मैं तुमसे दूर चली जाऊँ तो?” मैंने मजाक में कहा था “तो मैं तुम्हें वापस ले आऊँगा।”उसने मेरी तरफ देखा था।

उसकी आँखों में आँसू थे। मैंने पहली बार महसूस किया था कि बात मजाक की नहीं थी। मैंने उसका हाथ पकड़कर पूछा—

“कोई परेशानी है?” वह कुछ कहना चाहती थी।

लेकिन तभी पीछे से उसके पिता की आवाज आई—

“मीरा!” वह घबरा गई। जाते-जाते उसने सिर्फ इतना कहा—“मुझे माफ कर देना।”

और फिर चली गई।अगले दिन पता चला… मीरा अपने मामा के घर चली गई थी। फिर खबर आई कि उसकी शादी तय हो गई है।

मैंने उसे फोन किया। फोन बंद था। चिट्ठी भेजी। कोई जवाब नहीं आया। कुछ महीनों बाद पता चला कि उसकी शादी भी नहीं हुई।

उसके बाद…


उसके बारे में किसी ने कुछ नहीं बताया।


मैंने मान लिया कि वह अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गई होगी।


और मैंने अपनी जिंदगी को वहीं रोक दिया।


---


मैं फिर वर्तमान में लौट आया।


मेरे हाथ में उसका आखिरी ख़त था।


मैंने दूसरी लाइन पढ़ी।


“तुम्हें लगा होगा कि मैंने तुम्हें छोड़ दिया था। सच यह है कि मैं तुम्हें छोड़ना ही नहीं चाहती थी।”


मेरी आँखों के सामने सब धुंधला होने लगा।


आगे लिखा था—


“उस रात पिताजी को तुम्हारे बारे में पता चल गया था। उन्होंने कहा था कि अगर मैंने तुमसे शादी की तो वह तुम्हें बर्बाद कर देंगे। तुम्हारे पिता की दुकान पर कर्ज था। तुम्हारी छोटी बहन की पढ़ाई चल रही थी। मुझे डर था कि मेरी वजह से तुम्हारा परिवार टूट जाएगा।”


मैंने पढ़ना रोक दिया।

मुझे याद आया…

उन्हीं दिनों मेरे पिता अचानक बीमार पड़े थे।

दुकान पर कर्ज था।

घर में पैसों की बहुत परेशानी थी। और मुझे हमेशा लगा था कि मीरा ने मेरा साथ इसलिए छोड़ा क्योंकि मैं उसके लायक नहीं था।

लेकिन…

सच कुछ और था।

मैंने काँपते हाथों से अगला पन्ना खोला।

“राघव, मैंने तुमसे झूठ बोला था।”

फिर कुछ देर तक खाली जगह थी। उसके बाद लिखा था—

“मैंने तुमसे कहा था कि मैं तुम्हें भूल गई हूँ।”

“लेकिन मैं कभी नहीं भूली।” मेरी आँखों से आँसू गिरकर कागज पर जा रहे थे।

मैंने उन्हें पोंछा। और पढ़ता गया।

“तुम्हें शायद याद भी न हो, लेकिन तुम्हारी माँ ने एक बार मुझसे कहा था—‘बेटी, अगर प्यार सच्चा हो तो उसे पाने से ज्यादा जरूरी होता है उसे बचाए रखना।’ उस दिन मुझे समझ नहीं आया था। आज समझती हूँ।”

नीचे एक तारीख लिखी थी।

12 जनवरी। और उसके नीचे— “मैंने तुम्हें यह ख़त उसी दिन लिखा था।”

सात साल पहले। बारह जनवरी।

मैं कुर्सी पर बैठ गया। कमरे में अचानक बहुत सन्नाटा हो गया।

ख़त का आखिरी हिस्सा पढ़ने से पहले ही मेरे दिल में एक अजीब-सा डर पैदा हो गया था।

मैंने आगे पढ़ा।

“राघव, अगर तुमने मुझे अब तक याद रखा है तो मुझसे नाराज़ मत होना। और अगर भूल गए हो तो यह ख़त पढ़कर मुझे फिर याद मत करना।”

मैं रुक गया।

फिर नीचे लिखा था—

“क्योंकि मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम्हारी जिंदगी फिर वहीं लौट जाए।”

आखिरी पन्ने पर सिर्फ चार लाइनें थीं—

“मैंने तुम्हें खोया नहीं था राघव, मैंने तुम्हें बचाने के लिए खुद को तुमसे दूर किया था और शायद यही मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा प्रेम था।तुम खुश रहना… यही मेरी आखिरी इच्छा है।”

नीचे उसका नाम था—

मीरा। और उसके ठीक नीचे एक तारीख।

13 जनवरी।

मैंने कैलेंडर की तरफ देखा।

आज भी तारीख… 13 जनवरी ही थी।

मैंने माँ को बुलाया। उनसे पूछा—

“माँ, ये ख़त आपको मिला था?”

माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर उन्होंने धीरे से कहा—

“हाँ।” मैंने हैरानी से पूछा—

“आपने मुझे कभी दिया क्यों नहीं?”

माँ की आँखों में आँसू आ गए।

उन्होंने कहा— “क्योंकि उसने मुझसे कहा था कि इसे तुम्हें तभी देना, जब मुझे लगे कि तुमने जिंदगी जीना छोड़ दिया है।”

मैं उन्हें देखता रह गया। माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखा और बोलीं—

“बेटा, सात साल से तुम उसके इंतजार में नहीं थे… तुम उस दिन के इंतजार में थे, जिस दिन तुम्हें यकीन हो जाए कि उसने तुम्हें छोड़ा था।” मैं कुछ नहीं बोल पाया। माँ ने मेरी हथेली में एक और चीज रख दी। एक पुरानी तस्वीर। मीरा की। 

पीछे लिखा था— “अगर कभी यह तस्वीर राघव तक पहुँचे, तो समझना… मैंने उसे कभी भुलाया नहीं।”

उस रात मैं बहुत देर तक छत पर बैठा रहा सामने वही खेत थे। वही आसमान। 

वही हवा। बस सात साल गुजर चुके थे। मैंने पहली बार महसूस किया कि कुछ लोग हमारी जिंदगी से चले जाते हैं… लेकिन हमें छोड़कर नहीं जाते। वे हमारे भीतर एक हिस्सा बनकर रह जाते हैं।

हम उन्हें भूलते नहीं। बस उनके साथ जीना सीख जाते हैं। सुबह होने से पहले मैंने मीरा का आखिरी ख़त फिर पढ़ा। और पहली बार उसे सीने से लगाकर रोया। उसके लिए नहीं… बल्कि उन सात सालों के लिए, जो मैंने उसकी याद में जीने के बजाय उसके इंतजार में गुजार दिए थे।

कुछ दिन बाद मैंने शहर जाने का फैसला किया।

नई नौकरी। नई जगह। नई जिंदगी। जाते वक्त माँ ने पूछा— “मीरा को भूल जाओगे?”

मैं मुस्कुराया। “नहीं माँ… लेकिन अब उसकी याद के साथ जीना सीख जाऊँगा।”

बस चल पड़ी। गाँव पीछे छूटने लगा। खिड़की से बाहर देखते हुए मुझे लगा जैसे बरगद के पेड़ के नीचे कोई खड़ा है।

शायद मेरा भ्रम था। या शायद… कुछ यादें सच में इतनी मजबूत होती हैं कि वे हमें जाते हुए भी विदा करने आती हैं। मैंने जेब से वह आखिरी ख़त निकाला।आखिरी बार पढ़ा। फिर उसे मोड़कर अपनी डायरी में रख दिया।उसके बाद मैंने कभी उसे खोला नहीं।

क्योंकि कुछ खत बार-बार पढ़ने के लिए नहीं होते। कुछ खत…हमें आगे बढ़ाने के लिए आते हैं।

और शायद प्यार की सबसे खूबसूरत बात यही है… हर प्रेम कहानी का अंत साथ रहना नहीं होता। कुछ प्रेम कहानियाँ अधूरी रहकर भी पूरी होती हैं।क्योंकि उनमें पाने से ज्यादा किसी के लिए कुछ छोड़ देने की ताकत होती है।

और अगर कभी आपको भी कोई ऐसा इंसान याद आए… जिससे जिंदगी ने आपको दूर कर दिया हो, तो उसे बद्दुआ मत देना। बस एक बार मुस्कुरा देना। क्योंकि हो सकता है…किसी दूसरे शहर की किसी खिड़की के पास बैठा वह इंसान भी उसी वक्त आपको याद कर रहा हो।

और शायद उसके पास भी…

आपके नाम का कोई आखिरी ख़त रखा हो।




                        — मुसाफिर रिशु
                             Musafir rishu 

अगर इस कहानी में आपको अपनी जिंदगी का कोई हिस्सा दिखाई दिया हो, तो इसे उस इंसान तक जरूर पहुँचाइए, जिसे कभी आपने दिल से चाहा था।

बारिश रुकने के बाद

  बारिश रुकने के बाद बारिश उस रात कुछ इस तरह बरसी थी, जैसे आसमान कई दिनों से अपने भीतर दबा हुआ कोई दुख आज़ाद कर रहा हो। लगातार चार घंटे से प...