पहाड़ों पर चाय
आज का दिन थोड़ा सुकून से भरा था, किसी भी नौकरी पेशा इंसान की जिंदगी का सबसे खूबसूरत दिन छुट्टियों का होता है
और हमे नहीं पता था कि अगला दस दिन हमारी जिंदगी में इतना यादगार होगा
जब वह अपनी भाग दौड़ की जिंदगी में कुछ समय अपने लिए निकालता है, मेरे लिए तो यह पूरे दस दिन का समय था |और हमे नहीं पता था कि अगला दस दिन हमारी जिंदगी में इतना यादगार होगा
इतने में कुछ पुराने दोस्तों के फोन आ गए सब ग्रुप कॉल पर थे शिव ने कहा " अबे ऐसे ही मरना है या जिंदगी भी जियेंगे " सब सोचने लगे बात सही है कुछ खामोशी के बाद सबने पहाड़ों की ओर चलने का सोचा और इस ट्रिप का नाम मैंने दिया "पहाड़ों पर चाय"
नाम सुनकर सब हँसे, लेकिन मुझे नहीं पता था कि आने वाले दिनों में यही नाम हमारे सफर की सबसे खूबसूरत याद बन जाएगा।
सोमवार को हम सबको लखनऊ स्टेशन पर मिलना था।
समय था सुबह 8:30 बजे।
टिकटों की जिम्मेदारी शिवम ने ले ली थी। उसने सबके टिकट निकाल दिए और हमने अपने-अपने पैसे उसे भेज दिए।
मैं और सौरभ साथ में निकले।
हम दोनों के घरों के बीच सिर्फ तीन कॉलोनियों का अंतर था, लेकिन जिंदगी की व्यस्तता ऐसी थी कि कई-कई महीने मुलाकात नहीं हो पाती थी।
उस दिन हम दोनों एक ही ऑटो में बैठे थे।
सौरभ ने रास्ते में पूछा—
“भाई, सच में दस दिन निकाल पाएंगे?”
मैंने हँसकर कहा—
“नौकरी वापस आकर भी कर लेंगे, पहले जिंदगी जी लेते हैं।”
शायद उस समय हम दोनों को अंदाजा नहीं था कि ये बात आगे चलकर कितनी सही साबित होने वाली है।
हम करीब 8 बजे स्टेशन पहुँच गए।
स्टेशन पर हमेशा की तरह भीड़ थी। कोई जल्दी में था, कोई अपने परिवार को विदा कर रहा था और कोई हाथ में चाय लेकर ट्रेन का इंतजार कर रहा था।
लेकिन हमारे ग्रुप का कोई और सदस्य दिखाई नहीं दे रहा था।
पाँच दोस्तों में सिर्फ हम दो थे।
तभी शिव का फोन आया—
“यार, मुझे थोड़ी देर हो जाएगी।”
हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
सौरभ बोला—
“टिकट तो इसके पास हैं!”
अब हमारी चिंता बढ़ गई।
लेकिन कुछ ही देर बाद वही शिव सबसे पहले स्टेशन पर दिखाई दिया।
हमने उसे देखते ही कहा—
“भाई, तेरी वजह से हमारी तो जान निकल गई थी!”
वह हँसते हुए बोला—
“अरे, अभी तो सफर शुरू हुआ है।”
धीरे-धीरे बाकी दोस्त भी आ गए।
कुछ देर बाद हमारी ट्रेन भी प्लेटफॉर्म पर आ गई।
और फिर...
हम सब अपनी सीटों पर बैठ गए।
ट्रेन धीरे-धीरे स्टेशन से बाहर निकलने लगी।
मैं खिड़की के पास बैठा बाहर देख रहा था।
शहर पीछे छूट रहा था।
सामने सिर्फ रास्ता था।
और हमारे पास पूरे दस दिन।
🌙 ट्रेन की रात
कुछ घंटे तक बातें, हँसी-मजाक और पुराने किस्से चलते रहे।
फिर रात हो गई।
सबने अपने-अपने टिफिन निकाल लिए।
किसी के घर की पूरी-सब्जी थी, किसी के पास पराठे थे और किसी ने रास्ते के लिए जरूरत से ज्यादा खाना पैक कर लिया था।
हमने खाना खाया और फिर धीरे-धीरे डिब्बे में शांति होने लगी।
बाहर अंधेरा था।
ट्रेन अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी।
पता नहीं कब मेरी आँख लग गई।
🏔️ सुबह...
जब मेरी आँख खुली तो मैंने खिड़की के बाहर देखा।
कुछ पल के लिए मुझे समझ ही नहीं आया कि हम कहाँ पहुँच गए हैं।
फिर सामने पहाड़ दिखाई दिए।
उत्तराखंड।
मैं कुछ सेकंड तक चुपचाप खिड़की से बाहर देखता रहा।
शायद बाकी दोस्तों की नींद अभी पूरी नहीं हुई थी, लेकिन मेरी नींद पूरी हो चुकी थी।
क्योंकि जिस चीज के लिए हम निकले थे...
वो हमारे सामने थी।
पहाड़।
ठंडी हवा।
अनजान रास्ते।
और एक लंबा सफर।
मैंने दोस्तों को उठाया और कहा—
“उठो भाई... पहाड़ आ गए।”
सब खिड़की की तरफ देखने लगे।
किसी के चेहरे पर नींद थी, किसी के चेहरे पर उत्सुकता
और मेरे मन में सिर्फ एक बात थी—
“अब असली सफर शुरू हुआ है।” सब अपना सामान ले कर नीचे उतरे और स्टेशन पर चाय पीना तय हुआ तभी सौरभ जो खाने का सबसे ज्यादा शौकीन था उसने कहा " नहीं यार यहां नहीं अब हम उत्तराखंड में हैं तो थोड़ी शांत जगह चाय पीते हैं |
मुझे बात काफी पसंद आयी क्योंकि स्टेशन पर बहुत भीड़ थी जैसे मानो पूरा उत्तराखंड कहीं जा रहा हो फिर सबने ऑटो किया और एक सुनसान सड़क पर रुके जहां एक लंबी सड़क थी जो लोगों को उनकी मंजिल तक ले जाती जैसे हमसे पूछ रही हो "क्या तुम्हें भी कहीं जाने की जल्दी है " मैनें में मुस्कराते हुए लंबी साँस ली देखा तो सब मुझसे कुछ आगे निकल गए थे मैं मस्ती में चलने लगा ऊंचे ऊंचे पहाड़ मेरे जिंदगी की थकान मानो अपने में समेट ले गए कुछ दूर चले तभी उस सुनसान सड़क पर हमे एक चाय की टपरी दिखी हमे लगा जैसे किसी प्रेमी को उसकी बरसों की बिछडी प्रेमिका मिल गयी हो सौरभ खुशी से नाचने लगा मैंने भी उसके साथ मस्ती में कदम से कदम मिलाया और सब हंसते हुए टपरी पर आ गए
टपरी पुरानी थी एक बाबा चाय उबाल रहे थे चाय की खुशबू ने सबको मोहित किया और सबके लिए शिवम ने चाय बोल दी बाबा जी ने बताया कि वे जब 17 साल के थे तबसे इस टपरी पर चाय बना रहे हैं आज उनकी उम्र करीब 60 से कुछ ज्यादा ही होगी हमने विषमय से बाबा जी को देखा और सोचा कोई एक ही जगह पर इतने दिनों तक कैसे काम कर सकता है
तब तक चाय टेबल पर आ गयी होने चाय पी चाय मे बाबा जी के 60 सालों का अनुभव और सुकून था ऐसी चाय सायद ही कभी पी हो
पर ये अभी वह चाय नहीं थी जिसे पीने हम लखनऊ से उत्तराखंड आए थे
अचानक सौरभ का फोन बजा उसने फोन उठाया और कुछ सेकंड तक बिना कुछ बोले सुनता रहा। उसके चेहरे का रंग अचानक बदल गया।
हमने पूछा—“क्या हुआ?”
सौरभ ने फोन हमारी तरफ बढ़ाते हुए बस इतना कहा—
“भाई... हमें यहाँ से अभी निकलना होगा।”
हम सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
आखिर ऐसा क्या हुआ था कि जिस सफर के लिए हम इतने उत्साहित होकर निकले थे, उसी के बीच हमें वापस जाने की बात करनी पड़ रही थी?
जानेंगे “पहाड़ी पर चाय — भाग 2” में। ☕🏔️
लेखक
मुसाफिर रिशु
Musafir rishu
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