Monday, 28 September 2026

बारिश रुकने के बाद

 बारिश रुकने के बाद




बारिश उस रात कुछ इस तरह बरसी थी, जैसे आसमान कई दिनों से अपने भीतर दबा हुआ कोई दुख आज़ाद कर रहा हो।


लगातार चार घंटे से पानी गिर रहा था।


गाँव की कच्ची गलियाँ कीचड़ में बदल चुकी थीं। पुराने पीपल के पेड़ से पानी की बूँदें अब भी टपक रही थीं और दूर कहीं किसी छप्पर से टप-टप गिरता पानी रात की खामोशी को और गहरा कर रहा था।


मैं बरामदे में बैठा बारिश देख रहा था।


शहर से गाँव लौटे मुझे तीन दिन हुए थे।


पिताजी के जाने के बाद घर तो वही था, लेकिन घर में घर जैसा कुछ नहीं बचा था।


माँ अक्सर चुप रहती थीं। आँगन में रखी पुरानी चारपाई पर शाम को बैठतीं और देर तक सामने की गली देखती रहतीं।


मैंने कई बार पूछा—


“किसका इंतज़ार करती हो माँ?”


वह मुस्कुराकर कहतीं—


“किसी का नहीं।”


लेकिन कुछ इंतज़ार ऐसे होते हैं, जिन्हें स्वीकार करने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती।


उस रात करीब साढ़े दस बजे अचानक बिजली चली गई।


मैं उठकर लालटेन ढूँढ़ने लगा।


तभी बाहर से आवाज आई—


“राघव!”


मैं ठिठक गया।


यह आवाज मैंने बहुत वर्षों से नहीं सुनी थी।


मैं बरामदे से बाहर आया।


बारिश अब हल्की हो चुकी थी।


गेट के पास कोई खड़ा था।


चेहरा अँधेरे में साफ नहीं दिख रहा था।


मैंने पूछा—


“कौन?”


कुछ क्षण खामोशी रही।


फिर आवाज आई—


“मैं हूँ… मीरा।”


मेरे हाथ से लालटेन लगभग छूट गई।


मीरा।


वही मीरा, जो बारह साल पहले इस गाँव से चली गई थी।


वही मीरा, जिसके बारे में मैंने सुना था कि वह शहर जाकर शादी कर चुकी है।


वही मीरा, जिससे आखिरी बार मैंने स्टेशन पर कहा था—


“अगर कभी लौटना हो… तो बताना।”


और उसने जाते-जाते सिर्फ इतना कहा था—


“अगर लौट पाई, तो सबसे पहले तुम्हारे घर आऊँगी।”


बारह साल बीत गए थे।


मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि वह सच में आएगी।


मैंने दरवाज़ा खोला।


वह सामने खड़ी थी।


भीगे बाल, हाथ में पुराना कपड़े का बैग और आँखों में ऐसी थकान, जैसे उसने रास्ता नहीं, कोई लंबी लड़ाई तय की हो।


मैं कुछ पूछ पाता, उससे पहले उसने कहा—


“मुझे अंदर आने दोगे?”


मैंने रास्ता छोड़ दिया।


वह बरामदे में आकर बैठ गई।


माँ अंदर से बाहर आईं।


मीरा को देखते ही उनके चेहरे का रंग बदल गया।


लेकिन उन्होंने भी कोई सवाल नहीं किया।


बस इतना कहा—


“तू बहुत देर से आई।”


मीरा ने सिर झुका लिया।


“हाँ… बहुत देर हो गई।”


उस रात हम तीनों के बीच बहुत कुछ था, लेकिन बातचीत बहुत कम।


मीरा ने खाना खाने से मना कर दिया।


कुछ देर बाद उसने मुझसे पूछा—


“तुम्हारे पिताजी…?”


मैंने सिर झुका लिया।


“तीन महीने पहले।”


उसकी आँखें भर आईं।


“उन्होंने आखिरी समय में मेरा नाम लिया था?”


मैं चौंक गया।


“तुम्हें कैसे पता?”


मीरा ने मेरी तरफ देखा।


लेकिन जवाब नहीं दिया।


बस अपना बैग खोला और उसमें से एक पुराना लिफाफा निकाला।


लिफाफा पीला पड़ चुका था।


उस पर मेरे पिताजी की लिखावट थी।


मेरा नाम लिखा था—


राघव।


मैंने काँपते हाथों से लिफाफा लिया।


“ये क्या है?”


मीरा ने धीमे से कहा—


“उन्होंने मुझे दिया था।”


“कब?”


“बारह साल पहले।”


मैंने उसे देखा।


“तो अब क्यों?”


वह उठी और बरामदे की मुंडेर के पास जाकर खड़ी हो गई।


बारिश लगभग रुक चुकी थी।


उसने बाहर अँधेरे में देखते हुए कहा—


“क्योंकि अब वह वजह खत्म हो गई है, जिसकी वजह से उन्होंने मुझे चुप रहने को कहा था।”


मेरे भीतर जैसे कुछ टूटकर गिरा।


मैंने लिफाफा खोला।


अंदर सिर्फ एक पन्ना था।


पिताजी ने लिखा था—


«“राघव,

अगर यह पत्र तुम्हारे हाथ में है, तो समझना कि जिस बात को मैंने वर्षों तक तुमसे छिपाया, उसे जानने का समय आ गया है।

मीरा को तुमसे दूर मैंने किया था।

लेकिन वजह वह नहीं थी जो तुम समझते रहे।”»


मेरी साँस अटक गई।


मैं आगे पढ़ने लगा।


«“तुम्हारी माँ की बीमारी के समय घर पर बहुत कर्ज था। तुम्हारी पढ़ाई रुक जाती। मीरा के पिता ने मदद करने की कोशिश की थी, लेकिन उनके परिवार की अपनी मजबूरियाँ थीं।

मैंने मीरा से कहा कि वह तुमसे दूर हो जाए।

मैंने उससे यह भी कहा कि तुम्हें एक झूठ बता दे—कि उसे तुमसे कभी प्रेम था ही नहीं।”»


मेरी आँखें पन्ने पर जम गईं।


बारह साल।


बारह साल से मैं यही मानता रहा था कि मीरा ने मुझे छोड़ दिया था।


कि उसने किसी और को चुन लिया था।


कि मैं उसके लिए सिर्फ एक बीती हुई कहानी था।


मैंने काँपते हुए पूछा—


“तुमने… ये सब क्यों माना?”


मीरा मुस्कुराई।


वह मुस्कान बहुत दुखी थी।


“क्योंकि तुम्हारे पिताजी ने मुझसे कहा था कि अगर मैं तुमसे प्रेम करती हूँ, तो तुम्हें अपनी जिंदगी बनाने दूँ।”


मैं कुछ बोल नहीं पाया।


“फिर?”


“फिर मैं चली गई।”


“शादी?”


उसने सिर हिला दिया।


“नहीं।”


मैंने उसे देखा।


“तो इतने साल कहाँ थीं?”


उसने पहली बार मेरी आँखों में सीधे देखा।


“तुम्हारे शहर में।”


मेरे चेहरे पर हैरानी देखकर उसने कहा—


“तुम्हारे कॉलेज के पास एक छोटे से स्कूल में पढ़ाती थी।”


“तुमने कभी बताया क्यों नहीं?”


“क्योंकि तुम्हारे पिताजी ने आखिरी बार मुझसे कहा था—‘जब तक राघव अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए, उसे सच मत बताना।’”


मैंने धीरे से पूछा—


“और अब?”


उसने अपनी आँखें पोंछीं।


“अब तुम्हारे पिताजी नहीं हैं।”


बरामदे में फिर खामोशी उतर आई।


बाहर बारिश पूरी तरह रुक चुकी थी।


लेकिन मेरे भीतर जैसे बरसों पुरानी बारिश शुरू हो गई थी।


मैंने पत्र फिर पढ़ा।


नीचे एक और पंक्ति थी—


«“और हाँ, राघव…

अगर मीरा कभी लौटे, तो उससे यह मत पूछना कि वह इतने साल कहाँ थी।

बस यह पूछना कि क्या वह अब भी तुम्हारे साथ चाय पीना चाहती है।”»


मैं हँस दिया।


बारह साल बाद पहली बार।


मीरा भी हँस पड़ी।


आँखों में आँसू थे।


मैं रसोई में गया और चाय बनाने लगा।


माँ दरवाज़े के पास खड़ी हमें देख रही थीं।


उन्होंने धीमे से कहा—


“तुम्हारे पिताजी को पता था… बारिश के बाद मिट्टी की खुशबू लौटती है।”


मैंने चाय के दो कप मेज पर रखे।


मीरा ने कप उठाया।


बाहर बादलों के पीछे से चाँद निकल आया था।


गली में पानी जमा था।


पीपल के पत्तों से आखिरी बूँद गिरकर जमीन पर मिली।


मीरा ने चाय की चुस्की ली और बोली—


“राघव…”


“हाँ?”


“अगर उस रात बारिश नहीं हुई होती तो?”


मैंने मुस्कुराकर कहा—


“तो शायद तुम आज यहाँ नहीं होती।”


वह कुछ पल मुझे देखती रही।


फिर बोली—


“शायद बारिश इसलिए हुई थी।”


मैंने बाहर देखा।


सड़क पर पानी के बीच आसमान का चाँद साफ दिखाई दे रहा था।


मुझे अचानक लगा—


कुछ रिश्ते बारिश में टूटते नहीं हैं।


वे बस भीगकर चुप हो जाते हैं।



और फिर…


बारिश रुकने के बाद, जब दुनिया अपने पुराने रास्ते पर लौटती है, कुछ लोग उसी रास्ते पर वापस आ जाते हैं जहाँ उन्हें कभी छोड़ दिया गया था।


उस रात मैंने पहली बार समझा—


इंतज़ार हमेशा किसी के आने का नाम नहीं होता।


कभी-कभी इंतज़ार उस सच का होता है,

जिसे आने में बारह साल लग जाते हैं।

             मुसाफिर रिशु

Saturday, 19 September 2026

कोहरे के उस पार

 कोहरे के उस पार



सर्दियों में हमारे शहर की सुबह कुछ ऐसी होती थी जैसे किसी ने रात और दिन के बीच सफेद चादर टाँग दी हो।


दस कदम आगे का आदमी दिखाई नहीं देता था, लेकिन मोहल्ले की हर आंटी को यह पता रहता था कि शर्मा जी की बेटी कल रात कितने बजे घर आई थी।


कोहरा जितना घना था, खबरें उतनी ही साफ।


उस सुबह भी मैं छत पर खड़ा नीचे सड़क को देख रहा था।


सामने वाली चाय की दुकान से आवाज आई—


“भइया, चाय ले जाओ… ठंडी हो गई तो फिर गरम करने के पैसे लगेंगे!”


मैं नीचे उतर आया।


चाय वाले श्यामलाल की दुकान हमारे मोहल्ले की संसद थी।


वहाँ चाय कम और फैसले ज्यादा बनते थे।


किसकी नौकरी लगी, किसकी शादी होने वाली है, किसके लड़के ने बाइक खरीदी और किसकी लड़की फोन पर ज्यादा बात करती है—इन सबका जवाब श्यामलाल के पास था।


मैंने चाय उठाई।


तभी पीछे से आवाज आई—


“तुम अभी तक यहीं हो?”


मैंने पलटकर देखा।


मीरा।


गले में ऊनी दुपट्टा, हाथ में किताबें और चेहरे पर वही जल्दी में रहने वाली परेशानी।


“कहाँ जाऊँ?” मैंने पूछा।


“कहीं भी चले जाओ। रास्ता तो वैसे भी दिखाई नहीं दे रहा।”


“तो तुम क्यों आई हो?”


“कॉलेज जाना है।”


“इतने कोहरे में?”


“पढ़ने।”


मैंने चाय की चुस्की ली।


“तुम्हें देखकर तो नहीं लगता।”


वह मेरी तरफ घूरकर देखने लगी।


“तुम्हें देखकर तो लगता है कि बेरोजगारी ने तुम्हें दार्शनिक बना दिया है।”


श्यामलाल हँस पड़ा।


“बिटिया ठीक कह रही है।”


मैंने दोनों को देखा।


“एक दिन मेरी इज्जत जरूर होगी इस शहर में।”


मीरा बोली—


“उस दिन हमें पहचानना मत भूलना।”


मैंने कहा—


“तुम्हें कैसे भूलूँगा?”


वह एक पल को चुप हुई।


फिर बोली—


“अच्छा, रास्ता छोड़ो।”


वह कोहरे में आगे बढ़ गई।


मैं उसे तब तक देखता रहा जब तक वह दिखाई देना बंद नहीं हो गई।


अजीब बात थी।


उस सुबह कोहरा बहुत था।


लेकिन उसके जाने के बाद सड़क मुझे पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रही थी।


---


मीरा मेरे पड़ोस में पिछले दो साल से रह रही थी।


उसके पिता डाकघर में थे और माँ घर पर सिलाई करती थीं।


मीरा पढ़ने में अच्छी थी।


मैं पढ़ने में ठीक था।


बस फर्क इतना था कि वह किताब खोलती थी तो पढ़ती थी और मैं किताब खोलकर पहले दस मिनट सोचता था कि जिंदगी में आखिर करना क्या है।


हमारी दोस्ती भी किसी कहानी की तरह नहीं हुई थी।


एक दिन उसने मेरे दरवाजे पर आकर पूछा—


“आपके पास पिछले साल के गणित के नोट्स हैं?”


मैंने कहा—


“हैं।”


“दे देंगे?”


“हाँ।”


“कब?”


“जब मुझे मिल जाएँगे।”


वह मुझे पाँच सेकंड तक देखती रही।


“आपने रखे कहाँ हैं?”


मैंने बहुत गंभीर होकर कहा—


“यही तो समस्या है।”


उस दिन से वह मेरे कमरे में आती रही।


नोट्स लेने।


किताब लेने।


कभी पेन लेने।


और धीरे-धीरे बिना कुछ लिए भी।


मुझे बाद में समझ आया कि कुछ लोग जिंदगी में किसी काम से नहीं आते।


वे बस रहने लगते हैं।


---


मीरा का सपना था कि वह शिक्षक बने।


मेरा सपना हर छह महीने में बदलता था।


कभी सरकारी नौकरी।


कभी शहर में अपना काम।


कभी किसी कंपनी में बड़ी नौकरी।


और कभी लगता था कि गाँव लौटकर खेती ही कर लूँ।


माँ कहती थीं—


“पहले एक सपना पकड़ ले, फिर उसके पीछे भागना।”


मैं कहता—


“माँ, सपना पकड़ने से पहले पता तो चले सपना है क्या।”


माँ सिर पकड़ लेतीं।


मीरा मेरी बात सुनकर हँसती थी।


“तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या पता है क्या?”


“क्या?”


“तुम्हें हर रास्ता अच्छा लगता है, इसलिए कहीं पहुँचते नहीं।”


उस समय मुझे उसकी बात बुरी लगती थी।


आज लगता है, वह सही थी।


---


एक जनवरी की सुबह मीरा ने कहा—


“मैं जा रही हूँ।”


“कहाँ?”


“लखनऊ।”


“क्यों?”


“बी.एड. की तैयारी के लिए कोचिंग है।”


मैं चुप हो गया।


“कब?”


“अगले हफ्ते।”


“कितने दिनों के लिए?”


“शायद एक साल।”


मैंने हँसने की कोशिश की।


“एक साल में तो तुम हमें भूल जाओगी।”


उसने कहा—


“तुम्हें भूलना आसान नहीं है।”


मैं मुस्कराया।


फिर उसने तुरंत जोड़ा—


“इतना परेशान आदमी रोज कहाँ मिलेगा?”


मैंने राहत की साँस ली।


“मुझे लगा कुछ अच्छा बोलोगी।”


“बोला तो।”


उस शाम हम दोनों उसी चाय की दुकान पर बैठे थे।


श्यामलाल ने चाय रखते हुए पूछा—


“बिटिया, जा रही हो?”


“हाँ काका।”


“लखनऊ?”


“हाँ।”


उन्होंने मेरी तरफ देखा।


“और तू?”


“मैं?”


“तू कहाँ जाएगा?”


मैंने चाय पीते हुए कहा—


“मैं यहीं रहूँगा।”


श्यामलाल मुस्कराए।


“कुछ लोग जगह नहीं छोड़ते बेटा, बस समय उन्हें पीछे छोड़ जाता है।”


उस वक्त मुझे यह बात समझ नहीं आई।


---


मीरा चली गई।


पहले महीने रोज बात हुई।


दूसरे महीने एक दिन छोड़कर।


तीसरे महीने सिर्फ रविवार।


फिर कभी-कभी।


जिंदगी में दूरी अचानक नहीं आती।


वह पहले बातों के बीच आती है।


फिर जवाबों में।


फिर इंतजार में।


और एक दिन पता चलता है कि सामने वाला बहुत दूर चला गया है, जबकि उसने कहीं जाने की घोषणा भी नहीं की।


मीरा पढ़ाई में लग गई।


मैंने भी नौकरी की तैयारी शुरू कर दी।


मगर मेरे पास एक समस्या थी।


मैं पढ़ाई करने बैठता तो पाँच मिनट बाद फोन उठाकर देखता कि मीरा का संदेश आया या नहीं।


एक दिन उसने लिखा—


“तुम अपनी जिंदगी के साथ मजाक कर रहे हो।”


मैंने जवाब दिया—


“तुम्हारे बिना जिंदगी वैसे भी मजाक ही है।”


उसका जवाब नहीं आया।


दो घंटे बाद आया—


“बड़े हो जाओ।”


मैं हँसा।


लेकिन उस छोटे-से जवाब में मुझे पहली बार लगा कि शायद वह मुझसे कुछ ज्यादा चाहती थी।


या शायद मैं ही देर से समझ रहा था।


---


एक साल बाद मैं लखनऊ गया।


नौकरी का इंटरव्यू था।


इंटरव्यू खराब हुआ।


इतना खराब कि बाहर निकलते समय मुझे खुद पर दया आ गई।


मैंने मीरा को फोन किया।


“फेल हो गया।”


उसने पूछा—


“क्या?”


“इंटरव्यू।”


“अच्छा।”


“बस?”


“और क्या कहूँ?”


“थोड़ा दुखी हो जाओ।”


वह हँस पड़ी।


“तुम्हारा इंटरव्यू था, मेरी मौत थोड़ी हुई है।”


मैं भी हँस पड़ा।


फिर उसने कहा—


“शाम को मिलोगे?”


“कहाँ?”


उसने एक पता बताया।


मैं वहाँ पहुँचा।


वह एक छोटे-से पुस्तकालय के बाहर खड़ी थी।


मैंने उसे देखते ही कहा—


“तुम बदल गई हो।”


“कैसे?”


“पहले चोटी करती थीं।”


“अब बाल छोटे हैं।”


“नहीं।”


“तो?”


“पहले तुम्हें देखकर मैं कुछ बोल नहीं पाता था। अब भी नहीं पा रहा।”


वह हँसने लगी।


“तुम बिल्कुल नहीं बदले।”


हम पास के पार्क में बैठ गए।


बहुत देर तक बातें होती रहीं।


उसने बताया कि उसे स्कूल में अस्थायी नौकरी मिल गई है।


मैंने बताया कि घर की हालत ठीक नहीं चल रही।


पिताजी की तबीयत खराब रहती थी।


माँ की दवाइयाँ बढ़ गई थीं।


बहन की शादी करनी थी।


मीरा चुपचाप सुनती रही।


फिर उसने पूछा—


“तुम मेरे साथ चलोगे?”


मैंने उसकी तरफ देखा।


“कहाँ?”


“लखनऊ।”


“क्यों?”


“वहाँ स्कूल में एक और आदमी की जरूरत है। तुम्हारे लिए बात कर सकती हूँ।”


मैंने कुछ नहीं कहा।


“डरो मत,” उसने कहा।


मैं हँसा।


“मैं डर नहीं रहा।”


“फिर?”


“सोच रहा हूँ।”


वह बोली—


“तुम हमेशा सोचते रहते हो।”


मैंने पहली बार उसकी आँखों में देखकर कहा—


“क्योंकि हर फैसला सिर्फ मेरा नहीं होता।”


वह चुप हो गई।


---


मैं लखनऊ नहीं गया।


पिताजी की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी।


कुछ महीने अस्पताल और घर के बीच निकल गए।


फिर उनकी मृत्यु हो गई।


उस दिन के बाद जिंदगी का मतलब मेरे लिए कुछ समय के लिए बदल गया।


घर में उनकी कुर्सी खाली रहती थी।


माँ चुपचाप खाना बनाती थीं।


बहन की शादी की चिंता सामने थी।


और मैं पहली बार सचमुच बड़ा हो गया था।


मीरा ने कई बार फोन किया।


मैंने नहीं उठाया।


उसने संदेश भेजे।


मैंने जवाब नहीं दिया।


मुझे लगता था, मैं उसे अपने दुख में क्यों घसीटूँ?


लेकिन आदमी जब दुख में होता है तो अक्सर यही गलती करता है—


जिसे सबसे ज्यादा अपने पास होना चाहिए, उसी से सबसे ज्यादा दूर चला जाता है।


---


करीब आठ महीने बाद एक दिन डाकिया घर आया।


मेरे नाम एक पत्र था।


लिफाफे पर मीरा की लिखावट थी।


मैंने उसे खोला।


अंदर सिर्फ एक पन्ना था।


उसने लिखा था—


“तुम्हारे पिता के बारे में पता चला। देर से पता चला। माफ करना। तुमने मुझे अपने दुख में शामिल नहीं किया, इसका दुख ज्यादा है। आदमी अकेले दुख सहकर मजबूत नहीं होता। बस आदत डाल लेता है।”


नीचे एक और पंक्ति थी—


“और हाँ, मैं अगले महीने अपने शहर आ रही हूँ। अगर तुम फिर भागे, तो इस बार मैं तुम्हारे घर आ जाऊँगी।”


मैं पहली बार रोया।


शायद पिता के जाने पर भी उतना नहीं रोया था।


---


वह अगले महीने आई।


उसी जनवरी में।


सुबह फिर कोहरा था।


मैं चाय की दुकान पर बैठा था।


श्यामलाल बूढ़े हो गए थे।


मैंने पूछा—


“काका, आज धूप निकलेगी?”


उन्होंने कहा—


“धूप को आने में देर हो सकती है, बेटा। लौटना बंद नहीं करती।”


तभी पीछे से आवाज आई—


“तुम अभी तक यहीं हो?”


मैंने पलटकर देखा।


मीरा।


हाथ में वही किताबें।


बस इस बार आँखों में पहले से ज्यादा ठहराव था।


मैं हँसा।


“कहाँ जाता?”


वह मेरे सामने बैठ गई।


श्यामलाल ने बिना पूछे दो चाय बना दीं।


मीरा ने कप उठाया।


“अब क्या कर रहे हो?”


“पता नहीं।”


“फिर से?”


“हाँ।”


वह मुस्कराई।


“इस बार एक काम करो।”


“क्या?”


“जो सामने है, वही करो।”


“मतलब?”


“घर संभालो। माँ को संभालो। बहन की शादी करो। फिर अपने लिए सोचो।”


मैं उसे देखता रहा।


“और तुम?”


“मैं?”


“तुम कहाँ रहोगी?”


उसने चाय में फूँक मारते हुए कहा—


“यहीं।”


“हमेशा?”


वह मेरी तरफ देखने लगी।


“पता नहीं।”


मैंने पूछा—


“तुम्हें भी हर चीज का जवाब नहीं पता?”


वह हँस पड़ी।


“नहीं। मैं भी इंसान हूँ।”


दोनों हँसने लगे।


सड़क पर कोहरा अब थोड़ा कम हो रहा था।


सामने से सूरज की हल्की रोशनी दिखाई देने लगी।


---


उस दिन हम कोई बड़ा फैसला लेकर नहीं उठे।


न मैंने उससे प्रेम का इजहार किया।


न उसने कोई वादा किया।


हम बस साथ-साथ घर की तरफ चल पड़े।


रास्ते में उसने पूछा—


“तुम्हारी माँ अब भी सुबह तुलसी में पानी देती हैं?”


“हाँ।”


“और तुम्हारी बहन?”


“उसकी शादी अगले महीने है।”


“अच्छा।”


“तुम आओगी?”


वह मेरी तरफ देखकर बोली—


“नहीं आई तो तुम्हारी माँ मुझे घर से निकाल देंगी।”


मैं हँसा।


“माँ तुम्हें कभी नहीं निकालेंगी।”


“इतना भरोसा?”


“हाँ।”


“क्यों?”


मैंने कहा—


“क्योंकि उन्हें पता है, तुम्हारे आने के बाद मैं पहली बार जिंदगी को लेकर गंभीर हुआ हूँ।”


वह कुछ नहीं बोली।


बस चलते-चलते अपना दुपट्टा ठीक करने लगी।


उसकी आँखों में शायद मुस्कान थी।


---


कई साल बाद भी मुझे वह जनवरी याद है।


न इसलिए कि उस दिन कोई प्रेम कहानी पूरी हुई थी।


बल्कि इसलिए कि उस दिन मैंने जाना—


जिंदगी हमेशा साफ रास्ता दिखाकर आगे नहीं बढ़ाती।


कभी-कभी वह पहले चारों तरफ कोहरा करती है।


आपको कुछ दिखाई नहीं देता।


आप डरते हैं कि कहीं गलत दिशा में तो नहीं जा रहे।


फिर कोई अपना पास आकर बस इतना कह देता है—


“चलो, धीरे-धीरे चलते हैं। रास्ता दिखाई न भी दे, तो क्या हुआ।”


बाकी जिंदगी वहीं से आसान नहीं होती।


माँ फिर भी बीमार पड़ती हैं।


पैसे फिर भी कम पड़ते हैं।


नौकरी के लिए फिर इंटरव्यू देने पड़ते हैं।


कभी घर में झगड़ा होता है, कभी अपने ही फैसलों पर शक।


लेकिन फर्क इतना आता है कि आदमी अकेला नहीं रहता।


और शायद यही प्रेम का सबसे सुंदर रूप है।


किसी का हाथ पकड़कर सारी परेशानियाँ खत्म कर देना नहीं।


बल्कि परेशानियों के बीच खड़े होकर कहना—


“डरो मत, मैं हूँ।”


उस दिन कोहरे के उस पार कोई बहुत बड़ी मंजिल नहीं थी।


बस एक छोटा-सा घर था।


माँ की आवाज थी।


चूल्हे पर चढ़ी चाय थी।


बहन की शादी की तैयारियाँ थीं।


और मेरे साथ चलती हुई मीरा थी।


सूरज अब पूरी तरह निकल आया था।


मैंने पीछे मुड़कर उस सड़क को देखा।


जहाँ कुछ देर पहले तक कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।


मुझे लगा—


शायद जिंदगी भी ऐसी ही है।


हमें हमेशा पूरा रास्ता दिखाई देने की जरूरत नहीं होती।


कभी-कभी बस इतना काफी है कि कोहरे के उस पार कोई अपना हमारा इंतजार कर रहा हो।


और तब समझ आता है—


रास्ते कभी सच में खोते नहीं हैं।

बस कुछ देर के लिए कोहरे में छिप जाते हैं।


— मुसाफिर रिशु

Friday, 18 September 2026

धूप लौट आयी थी | एक दिल छू लेने वाली हिंदी साहित्यिक कहानी

 धूप लौट आयी थी




सर्दियों की धूप का अपना कोई घर नहीं होता।


वह कभी आँगन में उतर आती है, कभी खिड़की के चौखट पर बैठती है और कभी किसी पुराने रिश्ते की तरह जाने कब लौटकर चली जाती है।


उस दिन भी धूप बहुत देर से निकली थी।


दिसंबर की धुंध अभी पूरी तरह छँटी नहीं थी। छतों पर जमी नमी चमक रही थी और गली के मोड़ पर चाय वाले की दुकान से धुआँ उठ रहा था।


मैं बरामदे की पुरानी कुर्सी पर बैठा अखबार खोले हुए था, लेकिन पढ़ कुछ नहीं रहा था।


पिछले तीन दिनों से पिताजी अस्पताल में थे।


डॉक्टर ने कहा था—


“अब खतरे की बात नहीं है, मगर कुछ दिन आराम जरूरी है।”


घर में सब लोग राहत की साँस ले रहे थे।


माँ रसोई में थीं।


छोटी बहन दवा लेने गई थी।


और मैं उस धूप को देख रहा था जो सामने की दीवार पर धीरे-धीरे सरक रही थी।


तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।


मैंने सोचा, शायद दवा वाला होगा।


दरवाजा खोला।


सामने सुधा खड़ी थी।


बारह साल बाद।


पहचानने में मुझे एक पल भी नहीं लगा।


कुछ चेहरे समय के साथ बदलते हैं।


कुछ चेहरे समय को बदल देते हैं।


सुधा दूसरा वाला चेहरा थी।


वह पहले से शांत लग रही थी।


आँखों के किनारे हल्की-सी थकान थी, बाल पहले से छोटे थे और हाथ में कपड़े का एक साधारण-सा बैग।


उसने मेरी ओर देखते हुए पूछा—


“अंदर आ सकती हूँ?”


मेरे पास कहने के लिए बहुत कुछ था।


मगर मैंने सिर्फ इतना कहा—


“हाँ।”


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हम दोनों एक ही शहर में पले थे।


एक ही कॉलेज में पढ़े।


और कुछ साल तक एक-दूसरे की जिंदगी का वह हिस्सा रहे, जिसके बारे में किसी तीसरे व्यक्ति को बताने की जरूरत नहीं पड़ती।


सुधा मेरे घर से तीन गलियाँ छोड़कर रहती थी।


उसके पिता डाकखाने में थे और मेरे पिता तहसील में क्लर्क।


हमारे घरों के बीच कोई बड़ा अंतर नहीं था।


फिर भी एक अंतर था।


उनके घर में बेटियों के लिए फैसले जल्दी होते थे।


हमारे घर में बेटों से उम्मीदें जल्दी की जाती थीं।


शायद इसी वजह से हमारा प्रेम कभी प्रेम की तरह सामने नहीं आया।


वह पढ़ाई के बीच छिपा रहा।


किताबों के पन्नों में।


लाइब्रेरी की खिड़की के पास रखी दो कुर्सियों के बीच।


बस स्टैंड पर पाँच मिनट के इंतजार में।


और उन छोटी-छोटी बातों में जिन्हें उस उम्र में हम दोस्ती कहते रहे, जबकि दोनों जानते थे कि बात उससे कहीं आगे निकल चुकी है।


एक बार मैंने उससे पूछा था—


“अगर तुम्हें कभी शहर छोड़ना पड़े तो?”


उसने किताब बंद करके कहा था—


“तुम क्या करोगे?”


मैंने कहा—


“इंतजार।”


वह हँसी थी।


“इंतजार बहुत आसान शब्द है।”


तब मैं उसकी बात नहीं समझा था।


आज समझता हूँ।


इंतजार करना आसान होता है।


किसी को यह भरोसा दिलाना मुश्किल होता है कि वह तुम्हारे इंतजार में अपनी जिंदगी रोककर न बैठे।


---


कॉलेज के आखिरी साल में मुझे नौकरी मिल गई थी।


छोटी नौकरी थी।


तनख्वाह इतनी कि किराया और घर का खर्च निकल जाए।


मैं खुश था।


मुझे लगता था, अब मैं सुधा के घर जाकर उसके पिता से बात कर सकता हूँ।


लेकिन उसी समय पिताजी को अपनी छोटी बेटी की शादी करनी थी।


घर में पैसे नहीं थे।


माँ ने एक रात चुपचाप मेरे सामने अपनी चूड़ियाँ रख दी थीं।


“ये बेच देना।”


मैंने पूछा—


“क्यों?”


“बहन की शादी है।”


मैंने चूड़ियाँ वापस कर दीं।


“मेरी नौकरी लग गई है।”


माँ ने मेरी तरफ देखा।


“तू अपनी जिंदगी बना पहले।”


मैंने उस रात पहली बार समझा कि परिवार और प्रेम के बीच खड़ा आदमी अक्सर किसी एक को नहीं चुनता।


वह बस दोनों को खोने से डरता रहता है।


सुधा इंतजार करती रही।


मैं उससे कहता रहा—


“थोड़ा समय और।”


वह हर बार कहती—


“ठीक है।”


लेकिन ‘ठीक है’ के भीतर उसकी आवाज धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।


फिर एक दिन उसने पूछा—


“कितना समय?”


मेरे पास कोई उत्तर नहीं था।


उसने मुस्कराकर कहा—


“बस यही तो जानना चाहती थी।”


अगले महीने उसकी शादी तय हो गई।


उसने मुझे बताया नहीं।


मुझे किसी और से पता चला।


मैं उसके घर गया था।


वह आँगन में बैठी कपड़े तह कर रही थी।


मैंने पूछा—


“सच है?”


उसने सिर नहीं उठाया।


“हाँ।”


“तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”


वह कुछ देर तक कपड़े तह करती रही।


फिर बोली—


“तुमने भी तो कभी नहीं बताया कि मैं तुम्हारा इंतजार कितने साल करूँ।”


मैं चुप रहा।


उसने मेरी तरफ देखा।


आँखों में आँसू नहीं थे।


शायद रोने की उम्र निकल चुकी थी।


“तुम अच्छे हो,” उसने कहा।


मैं हँस पड़ा।


“ये तो बहुत खराब शुरुआत है।”


वह भी हल्का-सा मुस्कराई।


“नहीं। यह अंत है।”


---


उसकी शादी हो गई।


मैं शहर चला गया।


पिताजी रिटायर हुए।


बहन की शादी हुई।


माँ बूढ़ी हुईं।


जिंदगी अपनी गति से चलती रही।


कभी-कभी रात को अचानक सुधा याद आती।


मैं उसका नंबर खोलता।


फिर बंद कर देता।


एक बार उसके पति के साथ उसकी तस्वीर किसी रिश्तेदार ने भेजी थी।


मैंने देखी।


वह मुस्करा रही थी।


उस मुस्कान में कुछ भी गलत नहीं था।


बस मुझे उसमें अपना हिस्सा दिखाई नहीं दिया।


मैंने उसी दिन उसका नंबर डिलीट कर दिया।


लेकिन शायद नंबर मिटाने से कोई आदमी जिंदगी से नहीं मिटता।


---


“चाय पियोगी?”


मैंने पूछा।


सुधा ने सिर हिलाया।


“हाँ।”


मैं रसोई में गया।


दो कप चाय बनाई।


वापस आया तो वह बरामदे में उसी कुर्सी पर बैठी थी जहाँ मैं बैठा था।


मैंने कप उसके सामने रख दिया।


उसने कप उठाया।


“अभी भी बिना अदरक की चाय?”


मैंने उसे देखा।


“तुम्हें याद है?”


वह मुस्कराई।


“कुछ चीजें याद रखने के लिए याद नहीं करनी पड़तीं।”


हम दोनों चुप हो गए।


बाहर धूप अब और फैल गई थी।


सुधा ने पूछा—


“अंकल कैसे हैं?”


“अब ठीक हैं।”


“अच्छा है।”


फिर उसने बैग से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।


“माँ ने भेजा है।”


“क्या है?”


“गुड़ की पट्टी।”


मैं हँस पड़ा।


“तुम्हारी माँ अब भी बनाती हैं?”


“हाँ।”


“और तुम्हारे घर में अब भी वही नीम का पेड़ है?”


वह मेरी तरफ देखने लगी।


“तुम्हें सब याद है?”


मैंने कहा—


“नहीं। कुछ चीजें बस भूलती नहीं हैं।”


उसने चाय का कप नीचे रख दिया।


“तुमने शादी क्यों नहीं की?”


सवाल बहुत सीधा था।


लेकिन उसके पीछे बारह साल थे।


मैंने खिड़की की तरफ देखते हुए कहा—


“शायद किसी और को तुम्हारी जगह देने की हिम्मत नहीं हुई।”


सुधा ने तुरंत मेरी तरफ देखा।


मैंने पहली बार उसकी आँखों में वह पुरानी बेचैनी देखी।


“ऐसा मत कहो,” उसने धीरे से कहा।


“क्यों?”


“क्योंकि कुछ बातें बहुत देर से कही जाएँ तो उनका मतलब बदल जाता है।”


मैं चुप रहा।


वह कुछ देर बाद बोली—


“मेरी जिंदगी भी बहुत आसान नहीं थी।”


मैंने उसकी ओर देखा।


“क्या हुआ?”


“कुछ नहीं।”


“सुधा…”


वह मुस्कराई।


“तुम अब भी हर ‘कुछ नहीं’ के पीछे कहानी ढूँढ़ते हो।”


फिर उसने धीरे से कहा—


“शादी के बाद मुझे समझ आया कि किसी के साथ जिंदगी बिताना और किसी के साथ जिंदगी महसूस करना अलग बातें हैं।”


मैं कुछ नहीं बोला।


“वो बुरे आदमी नहीं थे,” उसने कहा, “बस हम एक-दूसरे के लिए सही लोग नहीं थे।”


“अब?”


“अब वो इस दुनिया में नहीं हैं।”


मैंने सिर झुका लिया।


उसने आगे कहा—


“तीन साल पहले चले गए।”


मेरे पास कहने के लिए कोई सांत्वना नहीं थी।


कुछ दुख ऐसे होते हैं जिनके सामने ‘मुझे दुख है’ कहना भी बहुत छोटा लगता है।


मैंने सिर्फ उसका कप फिर से उसकी तरफ सरका दिया।


वह उसे दोनों हाथों से पकड़कर बैठी रही।


---


“तुमसे एक बात कहनी थी,” उसने अचानक कहा।


मैंने उसकी तरफ देखा।


“उस दिन… मेरी शादी से पहले…”


वह रुक गई।


“हाँ?”


“मैंने तुम्हारा इंतजार किया था।”


मैंने कुछ नहीं कहा।


“पूरी रात।”


बाहर हवा चली।


नीम के सूखे पत्ते आँगन में गिरने लगे।


“मुझे लगा था, तुम आओगे।”


“मैं आया था।”


वह मेरी ओर देखने लगी।


“क्या?”


“तुम्हारे घर के बाहर।”


“कब?”


“तुम्हारी शादी से दो दिन पहले।”


वह स्तब्ध रह गई।


“फिर अंदर क्यों नहीं आए?”


मैं हँसा।


“क्योंकि तुम्हारे दरवाजे पर तुम्हारे पिता खड़े थे।”


“तुमने मुझे बुलाया क्यों नहीं?”


“क्योंकि मुझे लगा, अगर तुमने मेरा हाथ पकड़ लिया तो मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊँगा।”


“तो?”


“और मैं तुम्हें ऐसी जिंदगी नहीं देना चाहता था जिसमें हर महीने यह सवाल हो कि हमने सही किया या गलत।”


सुधा की आँखें भर आईं।


“तुम्हें क्या पता था कि मैं क्या चाहती थी?”


मैंने धीरे से कहा—


“नहीं पता था।”


“फिर फैसला तुमने क्यों किया?”


इस बार मेरे पास कोई उत्तर नहीं था।


क्योंकि कुछ फैसले हम दूसरों के लिए लेते हैं और बाद में पता चलता है कि सामने वाले ने हमसे वह फैसला माँगा ही नहीं था।


---


शाम होने लगी थी।


सुधा उठ खड़ी हुई।


“मुझे जाना चाहिए।”


मैंने पूछा—


“फिर आओगी?”


वह दरवाजे तक गई।


फिर पीछे मुड़ी।


“तुम बुलाओगे?”


“हाँ।”


वह मुस्कराई।


“तो आ जाऊँगी।”


वह चली गई।


मैं बरामदे में बहुत देर तक खड़ा रहा।


गली के उस पार धूप अब आखिरी बार दीवार पर ठहरी थी।


मैंने सोचा—


हम दोनों ने बारह साल यह मानकर बिताए कि हमने एक-दूसरे को खो दिया।


जबकि सच यह था कि हमने एक-दूसरे को कभी खोया ही नहीं था।


हमने बस अपने हिस्से का जीवन जी लिया था।


अगली सुबह मैं अस्पताल गया।


पिताजी सो रहे थे।


माँ खिड़की के पास बैठी थीं।


मैंने पूछा—


“माँ, धूप अच्छी है आज।”


माँ ने मुस्कराकर कहा—


“हाँ। कई दिनों बाद निकली है।”


मैंने खिड़की खोल दी।


धूप कमरे में फैल गई।


बहुत साधारण-सी धूप थी।


न उसमें कोई चमत्कार था, न कोई वादा।


फिर भी जाने क्यों मुझे लगा—


कुछ चीजें लौटती नहीं हैं।


वे वहीं होती हैं।


बस हमारे भीतर की धुंध इतनी गहरी हो जाती है कि हमें दिखाई नहीं देतीं।


उस दिन धूप सचमुच लौट आयी थी।


सुधा के रूप में नहीं।


किसी पुराने प्रेम को वापस पाने के रूप में भी नहीं।


वह मेरे भीतर उस आदमी के लिए लौटी थी, जिसे मैंने वर्षों पहले जिम्मेदारियों, डर और अधूरे फैसलों के नीचे कहीं दबा दिया था।


और शायद यही प्रेम की सबसे शांत सच्चाई है—


हर प्रेम का अंत मिल जाना नहीं होता।


कुछ प्रेम हमें बेहतर मनुष्य बनाकर चुपचाप हमारे भीतर रह जाते हैं।


सालों बाद जब जिंदगी थोड़ी ठंडी पड़ जाती है,


वे किसी सर्द सुबह की धूप की तरह लौटते हैं।


बिना आवाज़ किए।


बिना कुछ माँगे।


बस यह याद दिलाने—

कि जो सच में अपना था, उसे खोने के लिए हमेशा उससे दूर जाना जरूरी नहीं होता।

— मुसाफिर रिशु




Tuesday, 15 September 2026

जिसे मैंने खोया ही नहीं

 जिसे मैंने खोया ही नहीं




जिसे मैंने खोया ही नहीं

उसका नंबर मैंने कभी डिलीट नहीं किया।

पाँच साल हो गए थे।

न बात हुई, न मुलाकात। कभी-कभी व्हाट्सऐप पर उसकी तस्वीर बदलती दिखाई दे जाती थी, बस इतना ही।

फिर भी उसका नाम मेरी कॉन्टैक्ट लिस्ट में वैसे ही पड़ा था—

“नैना”

न कोई सरनेम, न कोई इमोजी।

सिर्फ नैना।

शायद इसलिए कि कुछ लोगों को नाम के साथ किसी पहचान की जरूरत नहीं होती।

वे जितने हमारे होते हैं, उतने ही हमारे भीतर भी रहते हैं।

---

उस शाम मैं ऑफिस से लौटकर कमरे में आया तो बाहर बारिश हो रही थी।

कमरा वही था—छोटा-सा, किराए का।

एक मेज, दो कुर्सियाँ, किताबों का बिखरा ढेर और खिड़की के पास रखा मनी प्लांट, जिसे मैं पिछले आठ महीने से बचाने की कोशिश कर रहा था।

फोन चार्ज पर लगाया और कपड़े बदलकर खिड़की के पास बैठ गया।

बारिश देखते हुए न जाने क्यों पुरानी बातें याद आने लगीं।

शायद बारिश का यही दोष है।

वह बाहर कम और भीतर ज्यादा बरसती है।

मैंने फोन उठाया।

पता नहीं क्यों, नैना का नंबर खोल लिया।

आखिरी चैट पाँच साल पुरानी थी।

उसमें मेरी तरफ से एक संदेश था—

“घर पहुँचकर बता देना।”

उसका जवाब था—

“हाँ।”

बस।

इतनी-सी बातचीत।

और उसके बाद पाँच साल की चुप्पी।

मैंने स्क्रीन बंद कर दी।

कुछ देर बाद फिर फोन उठाया।

इस बार मैंने नंबर पर उंगली रखी।

कॉल करने का मन हुआ।

फिर नहीं किया।

कुछ रिश्तों में सबसे बड़ी मुश्किल यही होती है कि आपको पता नहीं होता—

बात शुरू कहाँ से करें?

“कैसी हो?”

बहुत छोटा सवाल था।

लेकिन उसके पीछे पाँच साल खड़े थे।

---

नैना से मेरी मुलाकात कॉलेज के पहले साल में हुई थी।

वह कोई ऐसी लड़की नहीं थी जिसे देखते ही पूरी दुनिया रुक जाए।

वह बस उन लोगों में से थी जिनके साथ बैठकर दुनिया थोड़ी कम शोर वाली लगती है।

हमारी दोस्ती भी किसी फिल्म की तरह शुरू नहीं हुई थी।

एक दिन लाइब्रेरी में मेरी किताब उसके पास चली गई थी।

“ये आपकी है?”

उसने किताब उठाकर पूछा।

“हाँ।”

“आपने इसमें कुछ पढ़ा भी है?”

मैंने किताब वापस लेते हुए कहा—

“नहीं।”

वह हँस पड़ी।

“फिर?”

“किताब पास रखने से पढ़ाई हुई हुई लगती है।”

उस दिन से बात शुरू हुई।

फिर चाय।

फिर कैंटीन।

फिर कॉलेज की सीढ़ियाँ।

फिर रोज का इंतजार।

और फिर एक समय ऐसा आया जब हम दोनों को यह बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी कि हम एक-दूसरे के लिए क्या हैं।

हम कुछ थे।

लेकिन क्या थे—

यह कभी तय नहीं किया।

शायद दोस्त।

शायद उससे थोड़ा ज्यादा।

या शायद दो ऐसे लोग, जिन्हें एक-दूसरे की आदत हो गई थी।

---

आखिरी साल में नैना को दिल्ली में नौकरी मिल गई।

मुझे लखनऊ में।

उसने जाते समय कहा था—

“दूर रहोगे तो भूल जाओगे।”

मैंने हँसकर कहा—

“तुम्हें भूलना इतना आसान है क्या?”

उसने जवाब नहीं दिया।

बस मुस्करा दी।

फिर स्टेशन पर ट्रेन चलने लगी।

वह दरवाजे के पास खड़ी थी।

मैं प्लेटफॉर्म पर।

उसने हाथ हिलाया।

मैंने भी।

उस दिन मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि अगली बार उसे देखने में पाँच साल लग जाएंगे।

---

पहले कुछ महीने बात होती रही।

फिर कम।

फिर और कम।

एक दिन उसने कहा—

“घर वाले शादी की बात कर रहे हैं।”

मैंने पूछा—

“तुम क्या चाहती हो?”

उसने कहा—

“पता नहीं।”

मैंने कहा—

“अगर पता चले तो बताना।”

वह चुप रही।

मैंने भी।

कभी-कभी जिंदगी में सबसे बड़ी गलती कोई गलत बात कह देना नहीं होती।

सही बात कहने से डर जाना होती है।

मैं उस दिन कह सकता था—

“नैना, मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ।”

लेकिन मैंने नहीं कहा।

मुझे नौकरी का भरोसा नहीं था।

पैसों का नहीं।

घरवालों का नहीं।

खुद का भी नहीं।

मैंने सोचा—

पहले सब ठीक कर लूँगा।

फिर बात करूँगा।

लेकिन जिंदगी में “पहले” नाम की कोई मंजिल नहीं होती।

एक समस्या खत्म होती है तो दूसरी सामने खड़ी मिलती है।

और हम इंतजार करते रहते हैं कि एक दिन सब ठीक होगा।

वह दिन कभी नहीं आया।

---

दो साल बाद मुझे पता चला कि नैना की शादी हो गई।

किसी दोस्त ने बताया था।

मैंने सिर्फ इतना कहा—

“अच्छा।”

उस रात मैंने बहुत देर तक छत देखी थी।

रोया नहीं था।

शायद रोने के लिए भी किसी उम्मीद का बचा होना जरूरी होता है।

मेरी उम्मीद उस दिन चुपचाप कहीं बैठ गई थी।

लेकिन अजीब बात यह थी कि नैना चली गई, फिर भी मेरी जिंदगी से गई नहीं।

जब भी चाय बनाता, कप अपने आप दो रखने का मन करता।

किसी दुकान में नीली स्याही का पेन दिखता तो उसकी याद आती।

सर्दियों में धूप में बैठता तो याद आता कि वह हमेशा कहती थी—

“धूप में बैठकर बातें ज्यादा अच्छी लगती हैं।”

मैंने कभी उसे वापस पाने की कोशिश नहीं की।

न कोई संदेश।

न कोई शिकायत।

न कोई सवाल।

बस उसकी जगह अपनी जिंदगी में वैसी ही रहने दी।

---

पाँच साल बाद एक रविवार मैं पुराने कॉलेज गया।

एक दोस्त की शादी थी।

शादी खत्म होने के बाद शाम को मैं अकेला कॉलेज की तरफ निकल गया।

गेट वही था।

कैंटीन वही थी।

बस चेहरे बदल गए थे।

मैं उसी सीढ़ी पर जाकर बैठ गया जहाँ कभी हम दोनों बैठते थे।

काफी देर तक कुछ नहीं किया।

बस बैठा रहा।

तभी पीछे से किसी ने पूछा—

“यहाँ अभी भी किताबें नहीं पढ़ते?”

मैंने पलटकर देखा।

नैना।

कुछ पल के लिए मुझे लगा कि मैं उसे देख नहीं रहा, याद कर रहा हूँ।

वह पहले से थोड़ी बदल गई थी।

चेहरे पर पहले से ज्यादा ठहराव था।

आँखों के नीचे हल्की थकान।

हाथ में एक छोटा-सा बैग।

और वही मुस्कान।

“तुम?” मेरे मुँह से निकला।

“हाँ।”

“यहाँ कैसे?”

“एक काम था।”

“अच्छा।”

फिर चुप्पी।

पाँच साल की चुप्पी शायद इतनी बड़ी होती है कि उसके सामने शब्द छोटे पड़ जाते हैं।

वह मेरे पास बैठ गई।

कुछ देर बाद उसने पूछा—

“तुमने शादी नहीं की?”

मैंने हँसते हुए कहा—

“नहीं।”

“क्यों?”

मैंने उसकी तरफ देखा।

“पता नहीं।”

उसने नजरें झुका लीं।

फिर बोली—

“मैंने भी नहीं।”

मैं चौंका।

“लेकिन…”

“हाँ,” उसने बीच में ही कहा, “सबको लगा थी हो गई।”

मैं कुछ नहीं बोला।

“मेरी सगाई हुई थी,” उसने कहा, “शादी नहीं।”

“क्यों?”

वह कुछ देर चुप रही।

फिर बोली—

“क्योंकि जिस आदमी के साथ जिंदगी बितानी थी, उससे शादी से पहले एक सवाल पूछा था।”

“क्या?”

“क्या तुम मेरे साथ तब भी रहोगे, जब मैं खुश न रहूँ?”

मैं उसकी तरफ देखने लगा।

“उसने कहा—‘मैं तुम्हें खुश रखूँगा।’”

वह हल्का-सा मुस्कराई।

“मुझे जवाब चाहिए था। उसने वादा दे दिया।”

मैंने कुछ नहीं कहा।

वह आगे बोली—

“सगाई टूट गई।”

हवा में पेड़ों की आवाज थी।

मैंने पूछा—

“फिर मुझसे बात क्यों नहीं की?”

उसने मेरी तरफ देखा।

“तुमने भी तो नहीं की।”

मैं मुस्करा दिया।

“मुझे लगा तुम्हारी जिंदगी आगे बढ़ गई।”

“मुझे लगा तुमने मुझे पीछे छोड़ दिया।”

हम दोनों हँस पड़े।

बहुत हल्की-सी हँसी थी।

लेकिन उसके भीतर पाँच साल का बोझ था।

---

चलते समय नैना ने पूछा—

“एक बात पूछूँ?”

“हाँ।”

“तुमने मेरा नंबर अब तक क्यों रखा?”

मैंने फोन निकाला।

उसका नाम दिखाया।

“पता नहीं।”

वह बोली—

“झूठ।”

मैंने पहली बार सच कहा।

“शायद इसलिए कि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता था।”

वह चुप रही।

फिर बोली—

“लेकिन हम तो पाँच साल से अलग थे।”

मैंने फोन जेब में रख लिया।

“अलग होना और खो देना एक बात नहीं है, नैना।”

वह मेरी तरफ देखने लगी।

मैंने कहा—

“तुम मेरी जिंदगी में नहीं थीं, लेकिन मेरी जिंदगी से कभी गई भी नहीं।”

उसकी आँखों में हल्की नमी आ गई।

उसने तुरंत चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

“तुम अब भी बातें अच्छी करते हो।”

मैं हँसा।

“तुम अब भी बात बदल देती हो।”

कुछ देर हम सड़क पर साथ चलते रहे।

फिर वह एक मोड़ पर रुक गई।

“मैं चलूँ?”

“हाँ।”

“फिर मिलोगे?”

इस बार मैंने बिना सोचे कहा—

“हाँ।”

वह चली गई।

मैं वहीं खड़ा रहा।

पहले की तरह उसे जाते हुए देखता रहा।

बस इस बार मुझे पता था—

वह जा रही है।

लेकिन कहीं खो नहीं रही।

---

उस रात घर आकर मैंने पहली बार उसका नंबर डिलीट नहीं किया।

बल्कि उसके नाम के आगे कुछ भी नहीं लिखा।

न “पुरानी दोस्त”।

न “जरूरी इंसान”।

न कोई दिल।

कुछ रिश्तों को नाम देकर छोटा कर देना मुझे अब अच्छा नहीं लगता था।

मैंने फोन मेज पर रखा और खिड़की खोल दी।

बाहर हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी।

अचानक फोन बजा।

नैना का संदेश था—

“घर पहुँच गई।”

मैं देर तक उस चार शब्दों को देखता रहा।

पाँच साल पहले भी उसका आखिरी संदेश यही था—

“घर पहुँचकर बता देना।”

मैं मुस्करा दिया।

शायद जिंदगी ने उस अधूरी बातचीत को पाँच साल तक संभालकर रखा था।

मैंने जवाब लिखा—

“अच्छा। अबकी बार बात अधूरी मत छोड़ना।”

कुछ देर बाद उसका जवाब आया—

“इस बार नहीं।”

मैंने फोन बंद कर दिया।

उस रात मुझे पहली बार समझ आया—

कुछ लोग हमारी जिंदगी से चले जाते हैं, लेकिन हमारे भीतर से नहीं।

और कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते।

बस थोड़ी देर के लिए चुप हो जाते हैं।

कभी-कभी हम सोचते रहते हैं कि हमने किसी को खो दिया।

फिर बहुत साल बाद पता चलता है—

हमने उसे खोया ही नहीं था।

हमने बस उसे अपनी जिंदगी के एक ऐसे हिस्से में रख दिया था,

जहाँ समय पहुँच नहीं पाता।

— मुसाफिर रिशु

Friday, 11 September 2026

अधूरी मुलाकात

 अधूरी मुलाकात




कुछ मुलाकातें खत्म होने के बाद समझ आती हैं कि वे मुलाकातें थीं।


उस समय तो बस इतना लगता है कि सामने बैठा आदमी कुछ देर के लिए आया था और फिर चला गया।


राघव को भी उस शाम यही लगा था।


बारिश थम चुकी थी, मगर रेलवे स्टेशन की छतों से पानी अब भी टपक रहा था। प्लेटफॉर्म पर भीड़ कम थी। चाय वाले की केतली से उठती भाप हवा में घुल रही थी और अनाउंसमेंट की आवाज बीच-बीच में इतनी अस्पष्ट हो जाती कि लोग एक-दूसरे से पूछने लगते—


“कौन-सी ट्रेन?”


राघव प्लेटफॉर्म नंबर दो की आखिरी बेंच पर बैठा था।


उसके हाथ में टिकट था—लखनऊ जाने वाली रात की ट्रेन का।


वह पिछले छह साल से शहर में रह रहा था।


नौकरी, कमरा, महीने की तनख्वाह और महीने के खत्म होने से पहले खत्म हो जाने वाले पैसे—जिंदगी अब किसी पुराने कैलेंडर की तरह हो गई थी। तारीखें बदलती थीं, बाकी सब वैसा ही रहता था।


उस शाम वह बिना किसी खास काम के घर लौट रहा था।


बस माँ ने सुबह फोन करके कहा था—


“इस बार दो दिन ज्यादा रुक जाना।”


राघव ने हँसकर पूछा था—


“क्यों?”


माँ ने कहा—


“ऐसे ही।”


वह जानता था, माँ के ‘ऐसे ही’ के पीछे अक्सर कोई ऐसी बात होती थी जिसे वह फोन पर कह नहीं पाती थीं।


ट्रेन आने में अभी बीस मिनट थे।


तभी किसी ने उसके सामने आकर पूछा—


“राघव?”


उसने सिर उठाया।


सामने एक लड़की खड़ी थी।


नीले रंग का सूट, कंधे पर भूरा बैग और बालों में बारिश की कुछ बूंदें।


राघव कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।


फिर उसके मुँह से सिर्फ एक शब्द निकला—


“सिया?”


वह मुस्करा दी।


“पहचान लिया?”


राघव भी मुस्कराया।


“इतनी जल्दी भूलने लायक भी नहीं थीं।”


सिया हँसी।


वही हँसी।


छह साल बाद भी वैसी ही।


राघव को अचानक कॉलेज की सीढ़ियाँ याद आ गईं। कैंटीन की चाय, लाइब्रेरी की खिड़की, सर्दियों की धूप में बैठकर नोट्स पढ़ने का बहाना और शाम को घर जाने में रोज पाँच मिनट देर करने की आदत।


उन दिनों दोनों के बीच कुछ था।


लेकिन दोनों ने कभी उसे कोई नाम नहीं दिया था।


शायद डर था।


शायद उम्र छोटी थी।


या शायद दोनों को लगता था कि जो चीज़ बिना नाम के इतनी खूबसूरत है, उसका नाम रख दिया तो कहीं वह छोटी न पड़ जाए।


फिर एक दिन सिया चली गई।


शहर बदल गया।


नंबर बदल गए।


जिंदगी ने दोनों के बीच धीरे-धीरे इतना फासला रख दिया कि एक समय बाद राघव को यह भी याद नहीं रहा कि आखिरी बार उसने सिया से बात कब की थी।


और आज—


वह सामने खड़ी थी।


इतनी सहजता से, जैसे इन छह सालों के बीच कुछ हुआ ही न हो।


“बैठूँ?” सिया ने पूछा।


“हाँ।”


वह उसके पास बैठ गई।


कुछ देर दोनों चुप रहे।


अजीब बात थी।


जिन दो लोगों के पास कभी घंटों बातें होती थीं, आज उनके पास एक-दूसरे के सामने बैठकर कहने को कुछ नहीं था।


सिया ने पूछा—


“कैसे हो?”


“ठीक हूँ।”


“नौकरी?”


“चल रही है।”


“शादी?”


राघव हँसा।


“नहीं।”


सिया ने धीरे से कहा—


“अच्छा है।”


राघव ने उसकी तरफ देखा।


“तुम?”


सिया ने कुछ क्षण चुप रहकर कहा—


“मेरी भी नहीं हुई।”


फिर दोनों हँस दिए।


हँसी छोटी थी।


मगर उसके पीछे छह साल खड़े थे।


---


“तुम यहाँ कैसे?” राघव ने पूछा।


“स्कूल में इंटरव्यू था। कल वापस जाना है।”


“कहाँ रहती हो?”


“प्रयागराज।”


राघव ने सिर हिलाया।


“बहुत दूर।”


“हाँ।”


फिर चुप्पी।


सिया ने बैग से एक छोटी-सी डायरी निकाली।


राघव ने उसे देखते ही पहचान लिया।


“ये अभी तक है?”


सिया ने डायरी उसकी तरफ बढ़ा दी।


“तुमने दी थी।”


राघव ने डायरी हाथ में ली।


पुरानी हो चुकी थी।


किनारे घिसे हुए थे।


पहले पन्ने पर राघव की लिखावट थी—


“जो बातें कह न पाओ, उन्हें लिख देना।”


वह मुस्कराया।


“तुमने इसमें कुछ लिखा?”


सिया ने सिर हिलाया।


“बहुत कुछ।”


“दिखाओ।”


“नहीं।”


“क्यों?”


“कुछ बातें पढ़ने के लिए नहीं होतीं।”


राघव ने डायरी बंद कर दी।


उसे पहली बार लगा कि शायद वह छह साल से जिस सवाल से बच रहा था, वह आज उसके सामने बैठा है।


“सिया…”


“हम्म?”


“तुम उस दिन बिना बताए क्यों चली गई थीं?”


सिया ने उसकी तरफ देखा।


बारिश के बाद स्टेशन की हवा अचानक ठंडी लगने लगी।


“तुमने कभी पूछा नहीं।”


राघव चुप हो गया।


“मैं इंतजार करती रही थी।”


“किसका?”


“तुम्हारा।”


राघव के पास कोई जवाब नहीं था।


उसे याद आया।


कॉलेज का आखिरी सप्ताह।


सिया कई दिनों से उससे मिलना चाहती थी।


एक शाम उसने संदेश भेजा था—


“कल स्टेशन आना। जरूरी बात है।”


राघव उस दिन नहीं गया था।


उसे नौकरी के इंटरव्यू के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा था।


उसने सोचा था, लौटकर बात कर लेंगे।


वह लौटकर आया तो सिया जा चुकी थी।


उसके बाद उसने कभी पूछा नहीं कि वह क्या कहना चाहती थी।


शायद उसे डर था कि जवाब सुनने के बाद उसे कुछ करना पड़ेगा।


कुछ फैसले लेने पड़ेंगे।


और उस उम्र में राघव के पास प्रेम के लिए हिम्मत तो थी, लेकिन जिम्मेदारी के लिए नहीं।


सिया ने धीरे से पूछा—


“तुम आए क्यों नहीं थे?”


राघव ने नीचे देखते हुए कहा—


“डर गया था।”


“किससे?”


“तुमसे नहीं।”


“फिर?”


“तुम्हें खो देने से।”


सिया कुछ नहीं बोली।


कुछ देर बाद उसने कहा—


“अजीब हो।”


“क्यों?”


“जिसे खोने से डरते थे, उसी से मिलने नहीं आए।”


राघव ने उसकी तरफ देखा।


इस बार दोनों नहीं हँसे।


---


अनाउंसमेंट हुआ।


ट्रेन आने वाली थी।


सिया ने डायरी वापस बैग में रख ली।


राघव ने पूछा—


“तुम्हें कितने बजे निकलना है?”


“मेरी बस दस बजे है।”


“मेरी ट्रेन नौ बजकर पैंतालीस की।”


दोनों ने घड़ी देखी।


उनके पास सिर्फ पंद्रह मिनट थे।


छह साल बाद मिले थे।


और पंद्रह मिनट बाद फिर अलग हो जाना था।


सिया ने धीरे से कहा—


“समय को भी शायद हमसे कोई शिकायत है।”


राघव मुस्कराया।


“हमने भी तो कभी उसे समझने की कोशिश नहीं की।”


दूर से ट्रेन की रोशनी दिखाई देने लगी।


राघव का दिल अचानक तेज धड़कने लगा।


उसे लगा, छह साल पहले जो बात अधूरी रह गई थी, आज उसे पूरा कर देना चाहिए।


उसने पूछा—


“सिया, अगर उस दिन मैं आ जाता तो?”


सिया ने कुछ देर उसकी आँखों में देखा।


“तो शायद कहानी अलग होती।”


“और अब?”


सिया ने जवाब नहीं दिया।


ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुक गई।


लोग उठने लगे।


राघव भी खड़ा हो गया।


सिया ने कहा—


“तुम्हारा डिब्बा?”


“एस-चार।”


“मेरा बस अड्डा दूसरी तरफ है।”


दोनों कुछ कदम साथ चले।


फिर रास्ता अलग हो गया।


राघव ने पीछे मुड़कर देखा।


सिया भी वहीं खड़ी थी।


वह कुछ कहना चाहती थी।


शायद राघव भी।


मगर दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा।


ट्रेन चल पड़ी।


सिया प्लेटफॉर्म पर खड़ी रही।


राघव खिड़की के पास बैठ गया।


कुछ दूर जाने के बाद उसने जेब में हाथ डाला।


उसके हाथ में एक छोटा-सा कागज था।


राघव चौंक गया।


उसे याद नहीं था कि सिया ने कब उसकी जेब में रखा।


उसने कागज खोला।


उस पर लिखा था—


“इस बार भी तुम देर से समझे।”


नीचे एक पता था।


प्रयागराज का।


और उसके नीचे सिर्फ एक पंक्ति—


“अगर कभी बिना डर के मिलना हो, तो आ जाना।”


राघव ने कागज मोड़कर जेब में रख लिया।


उसने खिड़की से बाहर देखा।


स्टेशन पीछे छूट रहा था।


उसे लगा, शायद जिंदगी हर अधूरी कहानी को खत्म करने का मौका नहीं देती।


कभी-कभी वह बस एक दरवाजा खोलती है—


और देखती है कि तुम इस बार अंदर आते हो या नहीं।


---


तीन महीने बाद राघव प्रयागराज गया।


न कोई बड़ा फैसला लेकर।


न कोई वादा लेकर।


बस छुट्टी लेकर।


उसके पास सिया का वही पता था।


दरवाजे पर पहुँचकर उसने घंटी बजाने से पहले कई बार हाथ वापस खींचा।


फिर आखिरकार घंटी बजा दी।


दरवाजा खुला।


सिया सामने थी।


दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।


इस बार छह साल बीच में नहीं थे।


सिर्फ तीन महीने थे।


सिया मुस्कराई।


“बहुत देर कर दी।”


राघव ने भी मुस्कराकर कहा—


“हाँ।”


“अब भी डर लगता है?”


राघव ने सिर हिलाया।


“थोड़ा।”


“फिर आए क्यों?”


राघव ने पहली बार बिना नजरें चुराए उसकी तरफ देखा।


“क्योंकि पिछली बार डर की वजह से एक मुलाकात अधूरी रह गई थी।”


सिया कुछ नहीं बोली।


बस दरवाजा थोड़ा और खोल दिया।


“अंदर आओ।”


राघव अंदर चला गया।


शायद प्रेम हमेशा किसी को पा लेने का नाम नहीं होता।


कभी-कभी वह सिर्फ इतना होता है कि जिस बात को कहने में बरसों लग गए, उसे आखिरकार कह दिया जाए।


और कुछ मुलाकातें—


पूरी होने के बाद भी—


थोड़ी अधूरी ही अच्छी लगती हैं।


क्योंकि उनकी अधूरी जगह में ही तो अगली मुलाकात की वजह बची रहती है।


— मुसाफिर रिशु

Monday, 7 September 2026

उसके लिए

 उसके लिए 




सुबह के सात बजकर पैंतालीस मिनट हुए थे।


बस अड्डे के सामने वाली चाय की दुकान अभी ठीक से खुली भी नहीं थी। दुकानदार आधी नींद में बेंच पर पानी के छींटे मार रहा था और सड़क पर रात की धूल अब भी जमी हुई थी।


रवि रोज की तरह अपनी पुरानी साइकिल दुकान के पास खड़ी करके चाय लेने बैठ गया।


“आज फिर वही आधी चाय?” दुकानदार ने पूछा।


रवि मुस्कराया।


“पूरी पीने के पैसे नहीं हैं, काका।”


काका हँस पड़े।


“पैसे तेरे पास कभी पूरे होते भी हैं?”


रवि ने कोई जवाब नहीं दिया।


उसकी जेब में कुल सैंतालीस रुपये थे।


तीन दिन बाद मकान का किराया देना था। महीने की तनख्वाह अभी पाँच दिन दूर थी। घर से माँ का फोन दो बार आ चुका था और दोनों बार रवि ने यही कहा था—


“हाँ माँ, इस बार भेज दूँगा।”


उसे मालूम था कि इस बार भी शायद नहीं भेज पाएगा।


चाय खत्म करके वह बस अड्डे के पीछे वाली गली में बने एक छोटे से प्रिंटिंग प्रेस की ओर चल पड़ा, जहाँ वह पिछले चार साल से काम करता था।


रवि की जिंदगी में कोई बड़ी घटना नहीं थी।


सुबह काम पर जाना, शाम को कमरे पर लौटना, महीने के अंत में हिसाब लगाना कि किस चीज का खर्च अगले महीने तक टाला जा सकता है और रात में माँ से दो मिनट बात करके सो जाना।


बस इतना ही।


लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसके जीवन में एक छोटी-सी अजीब बात होने लगी थी।


हर सुबह उसकी मेज पर एक कप चाय रखा मिलता था।


बिना चीनी की।


जैसी उसे पसंद थी।


पहले दिन उसने सोचा, शायद मालिक ने रखी होगी।


दूसरे दिन भी वही हुआ।


तीसरे दिन उसने पूछ लिया—


“काका, मेरी मेज पर चाय कौन रख जाता है?”


प्रेस के बूढ़े चौकीदार ने कंधे उचकाए।


“मुझे क्या पता?”


“आप तो सुबह सबसे पहले आते हो।”


“हाँ, लेकिन मैं चाय नहीं रखता।”


रवि ने हँसकर बात टाल दी।


चौथे दिन उसने तय किया कि आज पता करके रहेगा।


वह रोज से दस मिनट पहले प्रेस पहुँच गया।


शटर के पास खड़े होकर उसने इंतजार किया।


साढ़े आठ बजे सफाई करने वाला लड़का आया।


नौ बजे मशीन चलाने वाला आया।


सवा नौ बजे मालिक आया।


लेकिन चाय?


वह आज भी उसकी मेज पर पहले से रखी थी।


कप से भाप निकल रही थी।


रवि कुछ देर उसे देखता रहा।


फिर कप उठाकर एक घूंट लिया।


वही स्वाद।


बिना चीनी।


उसने पहली बार सोचा—


आखिर कौन है, जो रोज मेरे लिए चाय रख जाता है?


---


अगले दिन रवि ने चाय नहीं पी।


कप वैसे ही मेज पर रखा रहा।


दोपहर तक ठंडा हो गया।


शाम को उसने कप उठाकर कूड़ेदान में डालना चाहा, फिर जाने क्यों रुक गया।


उसे लगा, जिस आदमी ने यह चाय रखी है, शायद वह किसी जवाब की उम्मीद कर रहा है।


उसने अगली सुबह मेज पर एक छोटा-सा कागज रख दिया—


“धन्यवाद। लेकिन आप हैं कौन?”


अगली सुबह कागज गायब था।


और उसके नीचे एक दूसरा कागज रखा था।


सिर्फ चार शब्द थे—


“जिसे आपकी जरूरत है।”


रवि कुछ देर तक उस कागज को देखता रहा।


उसे पहली बार इस बात से डर लगा।


जरूरत?


किसे?


उसने उस दिन किसी से कुछ नहीं पूछा।


शाम को कमरे पर लौटकर उसने माँ को फोन किया।


“माँ, तबीयत कैसी है?”


“ठीक हूँ बेटा।”


“कुछ चाहिए?”


माँ कुछ देर चुप रहीं।


फिर बोलीं—


“नहीं। तू अपना देख।”


रवि ने फोन रख दिया।


उसे अचानक याद आया—माँ हमेशा यही कहती थीं।


“तू अपना देख।”


जैसे माँ को अपने हिस्से की जरूरतें बताना आता ही न हो।


---


दो दिन तक कोई कागज नहीं आया।


चाय आती रही।


फिर एक सुबह कप के नीचे एक और पर्ची थी—


“आज घर फोन कर लेना।”


रवि के हाथ रुक गए।


यह बात उस अनजान आदमी को कैसे पता?


उसने तुरंत पीछे देखा।


प्रेस में सिर्फ मशीनों की आवाज थी।


उसने पहली बार महसूस किया कि कोई उसे देख रहा है।


दिन भर उसका मन काम में नहीं लगा।


शाम को वह सीधे कमरे पर जाने के बजाय उस चाय की दुकान पर पहुँचा जहाँ वह रोज सुबह बैठता था।


“काका,” उसने पूछा, “मेरी चाय कौन ले जाता है?”


काका ने उसकी तरफ देखा।


“कौन-सी चाय?”


“जो रोज मेरे प्रेस में पहुँचती है।”


काका ने नजरें फेर लीं।


रवि समझ गया।


“आप जानते हैं।”


काका चुप रहे।


“काका, कौन है?”


बहुत देर बाद उन्होंने धीमे से कहा—


“रवि, हर बात जानना जरूरी नहीं होता।”


“मेरे बारे में कोई रोज पता कर रहा है और आप कह रहे हो जानना जरूरी नहीं?”


काका ने लंबी साँस ली।


“कल सुबह जल्दी आ जाना।”


“क्यों?”


“तब समझ जाएगा।”


---


अगली सुबह रवि रोज से एक घंटे पहले दुकान पर पहुँच गया।


सर्दी बढ़ गई थी।


सड़क लगभग खाली थी।


काका ने चूल्हा जलाया और दो कुल्हड़ चाय रख दिए।


करीब दस मिनट बाद एक लड़की गली के मोड़ से आती दिखाई दी।


साधारण-सा सलवार-कुर्ता।


कंधे पर पुराना बैग।


हाथ में एक स्टील का टिफिन।


वह दुकान के सामने आकर रुकी।


“काका, इसे दे दीजिए।”


उसने टिफिन आगे बढ़ाया।


रवि ने उसकी तरफ देखा।


लड़की ने भी उसे देखा।


दोनों कुछ क्षण चुप रहे।


फिर रवि ने पूछा—


“आप?”


लड़की ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—


“आपको शायद याद नहीं होगा।”


रवि ने ध्यान से चेहरा देखा।


कहीं देखा हुआ जरूर था।


लेकिन कहाँ?


लड़की ने कहा—


“तीन साल पहले इसी बस अड्डे पर एक लड़का रोज शाम को बैठता था।”


रवि चुप रहा।


“वो लड़का बस का इंतजार करता था, लेकिन उसके पास किराया नहीं होता था।”


रवि के चेहरे का रंग बदल गया।


उसे याद आया।


तीन साल पहले की बात थी।


वह तब एक छोटी-सी दुकान पर काम करता था।


एक शाम बारिश में एक लड़का बस अड्डे पर बैठा रो रहा था।


रवि ने अपनी जेब में बचे आखिरी तीस रुपये उसे दे दिए थे।


लड़के ने पूछा था—


“भैया, वापस कैसे दूँगा?”


रवि ने कहा था—


“जब तुम्हारे पास हों, किसी और को दे देना।”


उसने कभी उस घटना के बारे में दोबारा नहीं सोचा था।


लड़की ने धीरे से कहा—


“वो लड़का मेरा छोटा भाई था।”


रवि कुछ नहीं बोला।


“उस रात वह घर नहीं आ रहा था। पिताजी बहुत गुस्से में थे। वह डरकर भाग गया था। आपके दिए पैसे से वह घर पहुँचा था।”


उसने टिफिन उसकी तरफ बढ़ाया।


“उस दिन से माँ कहती थीं कि जिसने हमारे बच्चे को घर पहुँचाया था, उसके लिए कभी कुछ कर पाएँ तो करना।”


रवि ने टिफिन नहीं लिया।


“लेकिन चाय?”


लड़की मुस्कराई।


“वो मेरी तरफ से।”


“और पर्चियाँ?”


“मेरी।”


“लेकिन आपको मेरे बारे में इतना सब कैसे पता?”


लड़की ने जवाब देने से पहले कुछ पल सोचा।


“मैं उसी प्रेस के सामने वाले स्कूल में पढ़ाती हूँ।”


रवि को याद आया—सुबह अक्सर एक लड़की स्कूल की तरफ जाते हुए दिखाई देती थी।


“आपने मुझे पहचान लिया था?”


“पहले दिन नहीं।”


“फिर?”


“एक दिन आपने माँ को फोन पर कहा था—‘माँ, इस महीने पैसे कम हैं, अगले महीने ज्यादा भेज दूँगा।’”


वह हँसी नहीं।


“मुझे उस दिन लगा… आप वही आदमी हैं, जिसने तीन साल पहले मेरे भाई को तीस रुपये दिए थे।”


रवि ने टिफिन ले लिया।


उसकी आँखें टिफिन पर टिकी थीं।


“इसमें क्या है?”


“पराठे।”


“क्यों?”


लड़की ने बहुत साधारण ढंग से कहा—


“क्योंकि आप रोज दोपहर में खाना नहीं खाते।”


रवि ने उसकी ओर देखा।


“आपको कैसे पता?”


“जिसे आपकी जरूरत हो, उसे बहुत कुछ पता चल जाता है।”


रवि के चेहरे पर पहली बार मुस्कान आई।


वही चार शब्द।


जो उसने उस पर्ची पर पढ़े थे।


---


उस दिन रवि ने पहली बार किसी से अपनी परेशानी नहीं छिपाई।


उसने कहा—


“माँ की दवा खत्म हो गई है।”


लड़की ने पूछा—


“कितने की आती है?”


“छह सौ।”


“तो इस महीने टिफिन में पराठे ज्यादा रख दूँगी।”


रवि हँस पड़ा।


“दवा के बदले पराठे?”


“नहीं। दवा आप लेंगे। पर खाना भी तो खाइएगा।”


कुछ रिश्ते इसी तरह शुरू होते हैं।


बिना नाम के।


बिना किसी वादे के।


बस किसी की छोटी-सी जरूरत को अपनी आदत बना लेने से।


---


करीब दो महीने बाद रवि की नौकरी चली गई।


प्रेस बंद हो गया था।


उस शाम वह उसी चाय की दुकान पर बैठा था।


जेब में फिर वही सैंतालीस रुपये थे।


काका ने चाय रखते हुए पूछा—


“अब क्या करेगा?”


रवि ने सड़क की तरफ देखा।


“पता नहीं।”


तभी पीछे से आवाज आई—


“एक काम है।”


वह मुड़ा।


वही लड़की थी।


“हमारे स्कूल में कंप्यूटर ऑपरेटर की जरूरत है। थोड़ी तनख्वाह है, लेकिन काम ठीक है।”


रवि ने हिचकते हुए पूछा—


“आपने बात की?”


“हाँ।”


“क्यों?”


लड़की ने इस बार मुस्कराकर जवाब दिया—


“क्योंकि तीन साल पहले आपने किसी अजनबी को तीस रुपये दिए थे।”


“तो?”


“तो शायद हिसाब पूरा होने में थोड़ा वक्त लगता है।”


रवि कुछ कह नहीं पाया।


काका ने चाय का कप उसकी तरफ बढ़ाया।


“पी ले।”


रवि ने कप उठाया।


आज चाय में चीनी थी।


उसने हैरानी से पूछा—


“काका, चीनी क्यों?”


काका हँस दिए।


“अब तो जिंदगी थोड़ी मीठी हो गई है न।”


रवि भी हँस पड़ा।


लेकिन जाते-जाते उसने लड़की से सिर्फ इतना पूछा—


“आपका नाम?”


लड़की ने कहा—


“संध्या।”


“और अगर मैं ये नौकरी नहीं कर पाया तो?”


“तो दूसरी ढूँढ़ लेंगे।”


“और अगर मैं फिर भी नहीं कर पाया?”


संध्या ने उसकी तरफ देखा।


“तो चाय तो मैं देती ही रहूँगी।”


रवि ने पहली बार महसूस किया कि किसी के साथ होने का मतलब हमेशा प्रेम नहीं होता।


कभी-कभी इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि—


जब आदमी खुद पर भरोसा खोने लगे, तब कोई दूसरा उसके हिस्से का थोड़ा-सा भरोसा संभालकर रख ले।


उस दिन घर लौटते हुए रवि ने माँ को फोन किया।


“माँ।”


“हाँ बेटा?”


“आज से दवा समय पर खानी है।”


“क्यों? पैसे भेजेगा?”


रवि मुस्कराया।


“हाँ।”


“कहाँ से आए?”


रवि ने पीछे मुड़कर देखा।


संध्या स्कूल के गेट के पास खड़ी थी।


उसने हाथ हिलाया।


रवि ने भी हाथ हिलाया।


फिर फोन पर बोला—


“किसी ने काम दे दिया है।”


माँ कुछ देर चुप रहीं।


फिर बोलीं—


“भगवान उसे खुश रखे।”


रवि ने आसमान की तरफ देखा।


शाम उतर रही थी।


उसे अचानक लगा, जिंदगी में कुछ लोग ऐसे आते हैं जिनके आने की कोई आवाज नहीं होती।


वे न कोई बड़ा वादा करते हैं, न जिंदगी बदलने का दावा।


बस चुपचाप आपकी मेज पर एक कप चाय रख जाते हैं।


और जब आप पूछते हैं—


“किसके लिए?”


तो जिंदगी बहुत धीरे से जवाब देती है—


“उसके लिए… जिसे लगा था कि वह बिल्कुल अकेला है।”


— मुसाफिर रिशु

बारिश रुकने के बाद

  बारिश रुकने के बाद बारिश उस रात कुछ इस तरह बरसी थी, जैसे आसमान कई दिनों से अपने भीतर दबा हुआ कोई दुख आज़ाद कर रहा हो। लगातार चार घंटे से प...