जनवरी की बरसात
जनवरी की एक शाम थी।ठंड अपने पूरे शबाब पर थी। आसमान पर बादल थे और हवा में एक अजीब-सी नमी घुली हुई थी। शहर की सड़कें रोज की तरह भाग रही थीं, लेकिन उस शाम सब कुछ थोड़ा धीमा लग रहा था।फिर बारिश शुरू हो गई।जनवरी की बरसात वैसे भी अजीब होती है। न गर्मी से राहत देती है, न ठंड को कम करती है।बस चुपचाप आती है और अपने साथ बहुत सारी पुरानी यादें ले आती है।मैं सड़क किनारे एक चाय की दुकान के पास खड़ा बारिश देख रहा था।हाथ में चाय थी और आँखें सड़क पर।पता नहीं क्यों, उस बारिश ने मुझे कई साल पीछे पहुँचा दिया।
उस जनवरी में भी ऐसी ही बारिश हुई थी।और वह मेरे साथ थी।उस दिन हम दोनों कॉलेज से निकलकर घर जा रहे थे।ठंडी हवा चल रही थी। रास्ते में अचानक बूंदें गिरने लगीं।
मैंने कहा—“लगता है बारिश होने वाली है।”
वह मुस्कुराकर बोली—“तो होने दो।”“तुम्हारे पास छाता तो है नहीं।”उसने मेरी तरफ देखकर कहा—“तुम हो न।”उसके उस छोटे-से जवाब ने उस दिन मुझे जितना खुश किया था, शायद वह उसे कभी समझ ही नहीं पाई।हम एक ही छाते के नीचे चलने लगे।
छाता छोटा था।बारिश धीरे-धीरे तेज हो रही थी।मैं कोशिश कर रहा था कि पूरा छाता उसके ऊपर रहे और खुद बारिश में भीगता जा रहा था।
कुछ दूर चलने के बाद उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे अपनी तरफ खींच लिया।“इतना भीग क्यों रहे हो?”मैंने हँसकर कहा—“तुम्हें भीगने से बचा रहा हूँ।”
वह बोली—“पागल हो तुम।”मैंने कहा—“हाँ…
वह कुछ नहीं बोली।बस मुस्कुराती रही।और शायद उस दिन बारिश से ज्यादा खूबसूरत उसकी वह मुस्कान थी।हमारा प्यार बहुत बड़ा नहीं था।न महंगे तोहफे थे।न बड़ी-बड़ी डेट।न रोज मिलने का मौका।हमारी मोहब्बत तो बस इतनी थी कि—वह पूछ लेती थी, “खाना खाया?”मैं कह देता था, “घर पहुँचकर फोन करना।”
वह नाराज़ होती तो मैं उसे मनाने के लिए बेवजह की बातें करता।
और जब मैं परेशान होता, तो वह सिर्फ इतना कहती—
“सब ठीक हो जाएगा… मैं हूँ न।”शायद प्यार यही होता है।किसी का जिंदगी में होना…और उसके होने से जिंदगी थोड़ी आसान लगने लगना।
किन जिंदगी हर कहानी को उसकी मर्जी से नहीं चलने देती।धीरे-धीरे हमारे बीच दूरियाँ आने लगीं।पहले बातें घंटों होती थीं।
फिर मिनटों में होने लगीं फिर कभी-कभी।
और एक दिन…बिल्कुल बंद।कोई बड़ा झगड़ा नहीं हुआ था।बस छोटी-छोटी गलतफहमियाँ जमा होती गईं।मैंने उसकी खामोशी को बेरुखी समझ लिया।उसने मेरी व्यस्तता को दूरी समझ लिया।दोनों के पास कहने को बहुत कुछ था…लेकिन दोनों इंतजार करते रहे कि पहले सामने वाला बोले।और इसी इंतजार में एक खूबसूरत रिश्ता धीरे-धीरे चुप हो गया।
कई महीने गुजर गए।
मैंने खुद को समझा लिया कि शायद हमारा साथ इतना ही था।लेकिन कुछ रिश्ते खत्म होने के बाद भी खत्म नहीं होते।वे हमारे अंदर कहीं चुपचाप रह जाते हैं।किसी गाने में।किसी सड़क परकिसी खुशबू में। या फिर…
जनवरी की बरसात में।
उस शाम मैं चाय की दुकान पर खड़ा था।बारिश तेज हो चुकी थी।मैंने चाय खत्म की और घर जाने के लिए मुड़ा।
तभी सामने से एक लड़की छाता लेकर आती दिखाई दी।कुछ कदम बाद मेरा दिल अचानक रुक-सा गया।वह वही थी।वही आँखें।वही मुस्कान।बस इस बार उसके बालों में पहले से ज्यादा बारिश थी और आँखों में शायद कुछ ज्यादा कहानी।हम दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे।फिर उसने धीरे से पूछा—
“अब भी बारिश में भीगते हो?”मैं मुस्कुरा दिया।“अब कोई छाता लेकर चलने वाला नहीं है।”वह कुछ पल चुप रही फिर छाता मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोली—“तो आज फिर साथ चलो।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
इतने सालों से जिस जवाब का इंतजार था, वह शायद उस एक वाक्य में मिल गया था।हम दोनों एक ही छाते के नीचे चलने लगे।
बारिश वही थी।ठंड वही थी।
सड़क वही थी।लेकिन इस बार हमारे बीच की खामोशी नहीं थी।रास्ते में उसने धीरे से कहा—“तुमने कभी फोन क्यों नहीं किया?”
मैंने कहा—“मुझे लगा तुम बात नहीं करना चाहती।”
वह हँसी। आँखों में नमी थी।“और मुझे लगा तुम्हें फर्क नहीं पड़ता।”मैंने कुछ नहीं कहा।क्योंकि कुछ रिश्तों में सबसे बड़ी गलती प्यार की कमी नहीं होती…बात न करने की होती है।हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे।बस दोनों अपने-अपने अहंकार और गलतफहमियों के पीछे छिपे हुए थे।उस रात हम बहुत देर तक बातें करते रहे।पुरानी शिकायतें भी हुईं।
आँसू भी आए।कुछ हँसी भी।और आखिर में उसने पूछा—
“अब?”मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा—“अब अगर जिंदगी ने फिर कभी दूर किया, तो इस बार हम खामोश नहीं रहेंगे।”
वह मुस्कुराई।“पक्का?”मैंने कहा—“जनवरी की इस बरसात की कसम।”वह हँस पड़ी।और उस हँसी में मुझे लगा जैसे कई सालों से बंद पड़ा कोई दरवाजा फिर खुल गया हो।
आज कई साल बाद भी जब जनवरी में बारिश होती है…मुझे वह शाम याद आती है।वह छोटा-सा छाता।ठंडी हवा।गरम चाय।भीगी हुई सड़क। और वह लड़की…
जिसने मुझे एक बात सिखाई—प्यार सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं है।प्यार उस इंसान को समझने की कोशिश करने का नाम है।उसकी खामोशी को सुनने का नाम है।गलती होने पर झुक जाने का नाम है।
और सबसे जरूरी…दूरी आ जाने के बाद भी रिश्ते को बचाने की कोशिश करने का नाम है।क्योंकि हर रिश्ते में बारिश आएगी।कभी गलतफहमी की।कभी मजबूरी की।कभी हालात की।लेकिन अगर दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़े रहें…तो बारिश कितनी भी तेज क्यों न हो,रास्ता फिर भी खूबसूरत लगने लगता है।और शायद इसीलिए…मुझे जनवरी की बरसात आज भी पसंद है।
क्योंकि मेरे लिए वह सिर्फ बारिश नहीं है।वह एक याद है।एक मुलाकात है।एक अधूरी कहानी का पूरा होना है।और उस प्यार की गवाही है…जो कभी खत्म नहीं हुआ था।बस कुछ समय के लिए
खामोश हो गया था।कुछ लोग मौसम की तरह आते हैं…और कुछ लोग मौसम बदल जाने के बाद भी हमारे साथ रहते हैं।
जनवरी की बरसात उन्हीं लोगों की याद है। ❤️


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