Sunday, 30 August 2026

सर्दियों की धूप

 सर्दियों में धूप




सर्दियों की सुबह भी अजीब होती है।

रात कितनी भी लंबी क्यों न लगे, सुबह होते ही खिड़की के पर्दे के पीछे से आती हल्की-सी रोशनी मन को बता देती है कि दिन शुरू हो चुका है।

लेकिन सर्दियों की सुबह में जल्दी कौन उठना चाहता है?

रजाई के अंदर की गर्माहट छोड़कर बाहर निकलने का मन ही नहीं करता। अलार्म बजता है, हम उसे बंद करते हैं और खुद से कहते हैं—“बस पाँच मिनट और…”


और वही पाँच मिनट कब आधा घंटा बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता।

फिर किसी की आवाज आती है—


“उठो बेटा… धूप निकल आई है।”


बस यही आवाज सर्दियों की सुबह को पूरा कर देती है।उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ था।

मैं काफी देर तक रजाई में पड़ा रहा। बाहर कोहरा था। पेड़ों की पत्तियाँ बिल्कुल शांत थीं और छत पर रखी बाल्टी का पानी इतना ठंडा था कि उसे देखकर ही हाथ पीछे खींच लेने का मन कर रहा था।

आखिरकार मैं उठा और बाहर आ गया।

आँगन में एक पुरानी चारपाई पड़ी थी। उसके पास दादी बैठी थीं। सिर पर ऊनी शॉल, हाथ में चाय का कप और चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान।

मैं उनके पास जाकर बैठ गया।

दादी ने बिना कुछ पूछे मेरे हाथ में चाय का कप पकड़ा दिया।

मैंने चाय की एक चुस्की ली।

गरम चाय और ठंडी हवा के बीच का वह एहसास… शायद सर्दियों की सबसे खूबसूरत चीजों में से एक है।

थोड़ी देर बाद सूरज की किरणें दीवार के ऊपर से झाँकने लगीं।



दादी चारपाई को धीरे-धीरे धूप की तरफ खिसकाने लगीं।

मैंने हँसते हुए पूछा—

“दादी, धूप भी कहीं जाती है क्या?”

उन्होंने मेरी तरफ देखा और बोलीं—

“धूप कहीं नहीं जाती बेटा… बस हमें उसकी कीमत समझने में देर लग जाती है।”

मैं चुप हो गया।

उस स वक्त शायद उनकी बात समझ नहीं आई थी।

लेकिन आज समझ आता है--

सर्दियों में धूप सिर्फ शरीर को गर्म नहीं करती।

वह मन को भी गर्म करती है।

गाँव के आँगन में बैठकर धूप सेंकते हुए पता ही नहीं चलता कि कब घंटों बीत गए।

कोई मूँगफली लेकर बैठा है।

कोई सरसों के खेतों की बात कर रहा है।

बच्चे धूप में खेल रहे हैं।कहीं दूर से चूल्हे के धुएँ की खुशबू आ रही है।और घर के किसी कोने से आवाज आती है—

“चाय बन गई है।”


फिर लगता है…शायद जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए बहुत बड़ी चीजों की जरूरत नहीं होती।

कभी-कभी एक चारपाई,एक कप चाय,कुछ अपने लोग और थोड़ी-सी धूप ही काफी होती है।---

शहरों में सर्दियाँ शायद थोड़ी अलग होती हैं।

यहाँ धूप निकलती भी है तो लोग उसे खिड़की के शीशे के पीछे से देखते हैं।

सुबह जल्दी ऑफिस जाना होता है।

ट्रैफिक में फँसना होता है।

मोबाइल पर लगातार नोटिफिकेशन आते रहते हैं।

दिन गुजर जाता है…

और हमें पता ही नहीं चलता कि आज सूरज निकला था या नहीं।

लेकिन गाँव में धूप का इंतजार किया जाता है।

लोग जानते हैं कि कब आँगन का कौन-सा हिस्सा धूप में आएगा।

किस दीवार के पास बैठने से ज्यादा गर्मी मिलेगी।

किस पेड़ के नीचे बैठकर दोपहर सबसे अच्छी लगेगी।और शायद इसी वजह से गाँव के लोगों के पास समय कम होने के बावजूद सुकून थोड़ा ज्यादा होता है।

उस दिन दादी के साथ बैठे-बैठे मैंने उनसे पूछा—“आपको सर्दियाँ इतनी पसंद क्यों हैं?”उन्होंने सामने खेतों की तरफ देखते हुए कहा—“क्योंकि सर्दियों में धूप की जरूरत समझ आती है।”मैं उनकी तरफ देखने लगा।

उन्होंने आगे कहा—

“गर्मी में धूप परेशान करती है, लेकिन ठंड में वही धूप इंतजार करवाती है। जिंदगी भी ऐसी ही है… जब सब ठीक चल रहा होता है तो छोटी-छोटी खुशियाँ दिखाई नहीं देतीं। लेकिन जब जिंदगी थोड़ी ठंडी पड़ती है न… तब किसी का साथ, किसी की बात और किसी की छोटी-सी मुस्कान भी धूप जैसी लगती है।”

उनकी बात सुनकर मैं कुछ देर तक कुछ बोल नहीं पाया।शायद हम बड़े होते-होते यही भूल जाते हैं।हम बड़ी खुशियों के पीछे भागते रहते हैं और छोटी खुशियों को रास्ते में छोड़ देते हैं।हमें लगता है कि खुश होने के लिए कुछ बड़ा होना चाहिए।जबकि कभी-कभी खुशी बस इतनी होती है कि कोई बिना पूछे चाय बना दे।

कोई कह दे—

“ठंड लग रही होगी, स्वेटर पहन लो।”कोई दूर रहते हुए फोन करके पूछ ले—

“खाना खाया?”और कभी…

कोई हमारे पास चुपचाप बैठा रहे बिना कुछ कहे।दोपहर तक धूप पूरे आँगन में फैल चुकी थी।

दादी चारपाई पर लेट गईं।

मैं पास ही बैठकर मोबाइल देखने लगा।फिर अचानक मेरी नजर उनके चेहरे पर पड़ी।उनकी आँखें बंद थीं।

चेहरे पर धूप पड़ रही थी और होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी।

मैंने मोबाइल नीचे रख दिया। उस पल लगा…

कुछ पल कैमरे में कैद करने के लिए नहीं होते, उन्हें बस जी लेना चाहिए।

मैं भी चारपाई पर बैठ गया।कुछ देर तक कोई बात नहीं हुई।

सिर्फ धूप थी।ठंडी हवा थी।

और हमारे बीच एक खामोशी थी, जो किसी बातचीत से कम खूबसूरत नहीं थी। शाम होने लगी।

सूरज धीरे-धीरे नीचे उतर रहा था।आँगन से धूप खिसककर दीवार तक पहुँच गई थी।मैं उठने लगा तो दादी ने कहा—

“कल फिर धूप में बैठना।”

मैंने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, कल बैठेंगे।”

लेकिन जिंदगी में “कल” हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता।

कुछ लोग अगले दिन हमारे साथ होते हैं।

कुछ नहीं होते।कुछ आँगन वैसे ही रहते हैं।कुछ आँगन हमेशा के लिए याद बन जाते हैं।

और कुछ सर्दियों की धूप…हर साल लौटकर आती है, लेकिन उसके साथ बैठने वाले लोग वही नहीं रहते।शायद इसलिए सर्दियों की धूप सिर्फ गर्म नहीं होती…वह हमें याद भी दिलाती है।उन लोगों की याद,जिनके साथ बैठकर हमने कभी समय की कीमत नहीं समझी।

उन दिनों की याद,

जब हमारे पास कम था लेकिन खुशियाँ ज्यादा थीं।

उस घर की याद,जहाँ कोई हमारा इंतजार करता था।और उन पलों की याद…जिन्हें हम उस वक्त साधारण समझते थे, लेकिन आज वही हमारी सबसे खूबसूरत यादें हैं।

आज भी जब सर्दियों में धूप निकलती है, मैं कुछ देर उसके पास बैठ जाता हूँ। कभी चाय लेकर। कभी बिना चाय के।

कभी अकेला। और कभी पुरानी यादों के साथ।

अब समझ आया है कि दादी सही कहती थीं—धूप कहीं नहीं जाती।

बस कभी-कभी हमारी जिंदगी इतनी भागने लगती है कि हम उसके पास बैठना भूल जाते हैं। इसलिए जब अगली बार सर्दियों की धूप आपके आँगन में उतरे…तो थोड़ी देर रुकिएगा। मोबाइल एक तरफ रख दीजिए। किसी अपने के पास बैठिए।

एक कप चाय पीजिए। और उस पल को महसूस कीजिए।

क्योंकि हो सकता है…आज की यही साधारण-सी दोपहर,

कुछ साल बाद आपकी जिंदगी की

सबसे खूबसूरत याद बन जाए।

क्योंकि सर्दियों की धूप सिर्फ शरीर को गर्म नहीं करती…

कुछ धूपें मन के उन कोनों तक भी पहुँचती हैं, जहाँ बहुत समय से ठंड जमी होती है।

मुसाफिर रिशु
Musafirrishu.blogspot.com 


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