बारिश रुकने के बाद
बारिश उस रात कुछ इस तरह बरसी थी, जैसे आसमान कई दिनों से अपने भीतर दबा हुआ कोई दुख आज़ाद कर रहा हो।
लगातार चार घंटे से पानी गिर रहा था।
गाँव की कच्ची गलियाँ कीचड़ में बदल चुकी थीं। पुराने पीपल के पेड़ से पानी की बूँदें अब भी टपक रही थीं और दूर कहीं किसी छप्पर से टप-टप गिरता पानी रात की खामोशी को और गहरा कर रहा था।
मैं बरामदे में बैठा बारिश देख रहा था।
शहर से गाँव लौटे मुझे तीन दिन हुए थे।
पिताजी के जाने के बाद घर तो वही था, लेकिन घर में घर जैसा कुछ नहीं बचा था।
माँ अक्सर चुप रहती थीं। आँगन में रखी पुरानी चारपाई पर शाम को बैठतीं और देर तक सामने की गली देखती रहतीं।
मैंने कई बार पूछा—
“किसका इंतज़ार करती हो माँ?”
वह मुस्कुराकर कहतीं—
“किसी का नहीं।”
लेकिन कुछ इंतज़ार ऐसे होते हैं, जिन्हें स्वीकार करने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती।
उस रात करीब साढ़े दस बजे अचानक बिजली चली गई।
मैं उठकर लालटेन ढूँढ़ने लगा।
तभी बाहर से आवाज आई—
“राघव!”
मैं ठिठक गया।
यह आवाज मैंने बहुत वर्षों से नहीं सुनी थी।
मैं बरामदे से बाहर आया।
बारिश अब हल्की हो चुकी थी।
गेट के पास कोई खड़ा था।
चेहरा अँधेरे में साफ नहीं दिख रहा था।
मैंने पूछा—
“कौन?”
कुछ क्षण खामोशी रही।
फिर आवाज आई—
“मैं हूँ… मीरा।”
मेरे हाथ से लालटेन लगभग छूट गई।
मीरा।
वही मीरा, जो बारह साल पहले इस गाँव से चली गई थी।
वही मीरा, जिसके बारे में मैंने सुना था कि वह शहर जाकर शादी कर चुकी है।
वही मीरा, जिससे आखिरी बार मैंने स्टेशन पर कहा था—
“अगर कभी लौटना हो… तो बताना।”
और उसने जाते-जाते सिर्फ इतना कहा था—
“अगर लौट पाई, तो सबसे पहले तुम्हारे घर आऊँगी।”
बारह साल बीत गए थे।
मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि वह सच में आएगी।
मैंने दरवाज़ा खोला।
वह सामने खड़ी थी।
भीगे बाल, हाथ में पुराना कपड़े का बैग और आँखों में ऐसी थकान, जैसे उसने रास्ता नहीं, कोई लंबी लड़ाई तय की हो।
मैं कुछ पूछ पाता, उससे पहले उसने कहा—
“मुझे अंदर आने दोगे?”
मैंने रास्ता छोड़ दिया।
वह बरामदे में आकर बैठ गई।
माँ अंदर से बाहर आईं।
मीरा को देखते ही उनके चेहरे का रंग बदल गया।
लेकिन उन्होंने भी कोई सवाल नहीं किया।
बस इतना कहा—
“तू बहुत देर से आई।”
मीरा ने सिर झुका लिया।
“हाँ… बहुत देर हो गई।”
उस रात हम तीनों के बीच बहुत कुछ था, लेकिन बातचीत बहुत कम।
मीरा ने खाना खाने से मना कर दिया।
कुछ देर बाद उसने मुझसे पूछा—
“तुम्हारे पिताजी…?”
मैंने सिर झुका लिया।
“तीन महीने पहले।”
उसकी आँखें भर आईं।
“उन्होंने आखिरी समय में मेरा नाम लिया था?”
मैं चौंक गया।
“तुम्हें कैसे पता?”
मीरा ने मेरी तरफ देखा।
लेकिन जवाब नहीं दिया।
बस अपना बैग खोला और उसमें से एक पुराना लिफाफा निकाला।
लिफाफा पीला पड़ चुका था।
उस पर मेरे पिताजी की लिखावट थी।
मेरा नाम लिखा था—
राघव।
मैंने काँपते हाथों से लिफाफा लिया।
“ये क्या है?”
मीरा ने धीमे से कहा—
“उन्होंने मुझे दिया था।”
“कब?”
“बारह साल पहले।”
मैंने उसे देखा।
“तो अब क्यों?”
वह उठी और बरामदे की मुंडेर के पास जाकर खड़ी हो गई।
बारिश लगभग रुक चुकी थी।
उसने बाहर अँधेरे में देखते हुए कहा—
“क्योंकि अब वह वजह खत्म हो गई है, जिसकी वजह से उन्होंने मुझे चुप रहने को कहा था।”
मेरे भीतर जैसे कुछ टूटकर गिरा।
मैंने लिफाफा खोला।
अंदर सिर्फ एक पन्ना था।
पिताजी ने लिखा था—
«“राघव,
अगर यह पत्र तुम्हारे हाथ में है, तो समझना कि जिस बात को मैंने वर्षों तक तुमसे छिपाया, उसे जानने का समय आ गया है।
मीरा को तुमसे दूर मैंने किया था।
लेकिन वजह वह नहीं थी जो तुम समझते रहे।”»
मेरी साँस अटक गई।
मैं आगे पढ़ने लगा।
«“तुम्हारी माँ की बीमारी के समय घर पर बहुत कर्ज था। तुम्हारी पढ़ाई रुक जाती। मीरा के पिता ने मदद करने की कोशिश की थी, लेकिन उनके परिवार की अपनी मजबूरियाँ थीं।
मैंने मीरा से कहा कि वह तुमसे दूर हो जाए।
मैंने उससे यह भी कहा कि तुम्हें एक झूठ बता दे—कि उसे तुमसे कभी प्रेम था ही नहीं।”»
मेरी आँखें पन्ने पर जम गईं।
बारह साल।
बारह साल से मैं यही मानता रहा था कि मीरा ने मुझे छोड़ दिया था।
कि उसने किसी और को चुन लिया था।
कि मैं उसके लिए सिर्फ एक बीती हुई कहानी था।
मैंने काँपते हुए पूछा—
“तुमने… ये सब क्यों माना?”
मीरा मुस्कुराई।
वह मुस्कान बहुत दुखी थी।
“क्योंकि तुम्हारे पिताजी ने मुझसे कहा था कि अगर मैं तुमसे प्रेम करती हूँ, तो तुम्हें अपनी जिंदगी बनाने दूँ।”
मैं कुछ बोल नहीं पाया।
“फिर?”
“फिर मैं चली गई।”
“शादी?”
उसने सिर हिला दिया।
“नहीं।”
मैंने उसे देखा।
“तो इतने साल कहाँ थीं?”
उसने पहली बार मेरी आँखों में सीधे देखा।
“तुम्हारे शहर में।”
मेरे चेहरे पर हैरानी देखकर उसने कहा—
“तुम्हारे कॉलेज के पास एक छोटे से स्कूल में पढ़ाती थी।”
“तुमने कभी बताया क्यों नहीं?”
“क्योंकि तुम्हारे पिताजी ने आखिरी बार मुझसे कहा था—‘जब तक राघव अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए, उसे सच मत बताना।’”
मैंने धीरे से पूछा—
“और अब?”
उसने अपनी आँखें पोंछीं।
“अब तुम्हारे पिताजी नहीं हैं।”
बरामदे में फिर खामोशी उतर आई।
बाहर बारिश पूरी तरह रुक चुकी थी।
लेकिन मेरे भीतर जैसे बरसों पुरानी बारिश शुरू हो गई थी।
मैंने पत्र फिर पढ़ा।
नीचे एक और पंक्ति थी—
«“और हाँ, राघव…
अगर मीरा कभी लौटे, तो उससे यह मत पूछना कि वह इतने साल कहाँ थी।
बस यह पूछना कि क्या वह अब भी तुम्हारे साथ चाय पीना चाहती है।”»
मैं हँस दिया।
बारह साल बाद पहली बार।
मीरा भी हँस पड़ी।
आँखों में आँसू थे।
मैं रसोई में गया और चाय बनाने लगा।
माँ दरवाज़े के पास खड़ी हमें देख रही थीं।
उन्होंने धीमे से कहा—
“तुम्हारे पिताजी को पता था… बारिश के बाद मिट्टी की खुशबू लौटती है।”
मैंने चाय के दो कप मेज पर रखे।
मीरा ने कप उठाया।
बाहर बादलों के पीछे से चाँद निकल आया था।
गली में पानी जमा था।
पीपल के पत्तों से आखिरी बूँद गिरकर जमीन पर मिली।
मीरा ने चाय की चुस्की ली और बोली—
“राघव…”
“हाँ?”
“अगर उस रात बारिश नहीं हुई होती तो?”
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“तो शायद तुम आज यहाँ नहीं होती।”
वह कुछ पल मुझे देखती रही।
फिर बोली—
“शायद बारिश इसलिए हुई थी।”
मैंने बाहर देखा।
सड़क पर पानी के बीच आसमान का चाँद साफ दिखाई दे रहा था।
मुझे अचानक लगा—
कुछ रिश्ते बारिश में टूटते नहीं हैं।
वे बस भीगकर चुप हो जाते हैं।
और फिर…
बारिश रुकने के बाद, जब दुनिया अपने पुराने रास्ते पर लौटती है, कुछ लोग उसी रास्ते पर वापस आ जाते हैं जहाँ उन्हें कभी छोड़ दिया गया था।
उस रात मैंने पहली बार समझा—
इंतज़ार हमेशा किसी के आने का नाम नहीं होता।
कभी-कभी इंतज़ार उस सच का होता है,
जिसे आने में बारह साल लग जाते हैं।


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