सौरभ ने फोन हमारी तरफ बढ़ाते हुए बस इतना कहा—
“भाई... हमें यहाँ से अभी निकलना होगा।”
हम सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
मैंने जल्दी से फोन छीनना चाहा लेकिन शिवम ने मुझसे पहले ही फोन ले लिया उसने बिना कुछ कहे फोन को कान पर लगाया और थोड़ी दूर चला गया |
हम सबने एक दूसरे को देखा सब उदास हो गए, मैंने सोचा लगता है सफर यही तक का था हमने अभी पहाड़ों पर चाय भी नहीं पी थी पर थोड़ा सुकून था कि हमने बाबा जी की 60 साल के अनुभव वाली चाय पी थी | पर अब लगता है 10 दिन का यह सफर आज ही खत्म होगा और हमे वापस लखनऊ जाना पड़ेगा यही से मैं यह सोच कर दुखी हो रहा था तभी सौरभ हंसने लगा और शिवम भी हंसते हुए हमे चिढ़ाने लगा
सौरभ ने फोन जेब में रखा और वापस हमारी तरफ आकर बैठ गया। हम सबकी नजरें उसी पर थीं।
“अब बता भी दे भाई, किसका फोन था?” शिव ने बेसब्री से पूछा।
सौरभ मुस्कुराया और बोला, “मेरे एक पुराने दोस्त का था, जो यहीं उत्तराखंड में रहता है।”
“तो इसमें इतना सस्पेंस्य क्या है?” मैंने हँसते हुए कहा।
सौरभ ने सामने पहाड़ों की तरफ देखा और बोला,
“उसने ऐसी जगह के बारे में बताया है जहाँ शायद हममें से कोई पहले कभी नहीं गया।”
हम सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
शिव ने तुरंत अपना बैग उठाया—
“चलो फिर, चाय बाद में पी लेंगे।”
हम हँस पड़े।
कुछ ही देर में हम अपना सामान लेकर उस अनजान रास्ते पर निकल पड़े। सड़क धीरे-धीरे संकरी होती जा रही थी और मोबाइल का नेटवर्क भी गायब होने लगा था।
शहर की ऊँची इमारतों की जगह अब सिर्फ पहाड़ थे।
और तभी मुझे एहसास हुआ—
हम सिर्फ घूमने नहीं आए थे… शायद ये सफर हमें कुछ ऐसा देने वाला था, जिसे हम जिंदगी भर याद रखने वाले थे रास्ते पर चलते हुए सौरभ बार-बार रास्ते की फोटो लेने के लिए फोन निकाल लेता और शिवम उसे चिढ़ाते हुए कहता—
“भाई, फोटो ही खींचता रहेगा या पहाड़ भी देखेगा?”
मैं चुपचाप बाहर देख रहा था। हवा में मिट्टी और देवदार के पेड़ों की खुशबू थी। शहर में जिस शोर से हम भागकर आए थे, यहाँ उसकी जगह सिर्फ हवा की आवाज और कभी-कभी किसी पक्षी की आवाज सुनाई दे रही थी।
कुछ दूर जाने के बाद सड़क खत्म जैसी हो गई। आगे सिर्फ पत्थरों और मिट्टी का रास्ता था।
हमने अपना सामान उठाया और पैदल चलना शुरू कर दिया।
पहले तो सब बड़े जोश में थे, लेकिन लगभग आधे घंटे बाद शिवम बोला—
“भाई, जिस जगह के लिए आए हैं वो यहीं है या ऊपर भगवान के घर तक जाना है?”
सब जोर से हँस पड़े।
चलते-चलते अचानक पेड़ों के बीच से एक छोटा-सा खुला मैदान दिखाई दिया।
और उसके सामने...
पहाड़ों का ऐसा नज़ारा था कि हम सब वहीं रुक गए।
दूर-दूर तक पहाड़ ही पहाड़ थे। कुछ पहाड़ों पर बादल ऐसे बैठे थे जैसे किसी ने उन्हें सफेद चादर से ढक दिया हो। नीचे एक छोटी-सी नदी दिखाई दे रही थी और उसके किनारे कुछ घर।
कुछ सेकंड के लिए कोई कुछ नहीं बोला।
फिर सौरभ ने धीरे से कहा—
“यार... इतनी खूबसूरत जगह भी होती है?”
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“इसीलिए तो आया हूँ।”
हमने अपना सामान एक तरफ रखा और वहीं बैठ गए।
किसी ने फोन निकालकर गाने चला दिए। कोई फोटो लेने लगा और शिवम हमेशा की तरह सबकी फोटो खराब करने में लगा हुआ था।
हमने खूब मस्ती की। कभी एक-दूसरे को धक्का देते, कभी पुराने कॉलेज के किस्से याद करके हँसते और कभी बिना किसी वजह के बस पहाड़ों को देखते रहते।
शाम होने लगी थी।
ठंडी हवा अब और तेज हो गई थी।
तभी पास एक छोटी-सी दुकान दिखाई दी। दुकान बहुत साधारण थी—लकड़ी की एक छोटी-सी छत, सामने कुछ बिस्कुट के पैकेट और एक चूल्हे पर चाय चढ़ी हुई थी।
मैंने मन मे सोचा रोज बाबा इतनी ऊँची पहाड़ी चढ़ कर चाय बनाने आते हैं!
फिर कुछ देर बाद पता चला बाबा इसी पहाड़ी पर रहते है उनका घर यही पहाड़ी पर है और वो और उनकी पत्नी साथ रहते हैं
बाबा ने बताया दूसरी तरफ एक रास्ता है जिससे पहाड़ चढ़ना आधे घंटे का काम है बस हम एक दूसरे को देख कर हसने लगे
बाबा चूल्हे पर चाय बना रहे थे।
शिव ने पूछा—
“बाबा, पाँच चाय मिल जाएंगी?”
बाबा मुस्कुराए और बोले—
“चाय तो मिल जाएगी बेटा, लेकिन पहाड़ की चाय पीने के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा।”
हम सब बैठ गए।
कुछ देर बाद बाबा ने हमें चाय दी।
मैंने पहला घूंट लिया और कुछ पल के लिए आँखें बंद कर लीं।
सच कहूँ तो वह चाय सिर्फ चाय नहीं थी।
उसमें पहाड़ की ठंडक थी, सफर की थकान थी और शायद उन दस दिनों की शुरुआत भी थी जिनका हम इतने दिनों से इंतजार कर रहे थे।
मैंने हँसते हुए कहा—
“भाई, ट्रिप का नाम सही रखा था मैंने— पहाड़ों पर चाय।”
सब हँस पड़े।
उसी समय मेरी नजर सामने पहाड़ों की तरफ गई।
सूरज धीरे-धीरे पहाड़ों के पीछे छिप रहा था और आसमान का रंग सुनहरा हो गया था।
मैं चुपचाप वही देख रहा था कि तभी मेरे पास एक आवाज आई—
“सुंदर है ना?”
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
एक लड़की थी जिसे हमने रास्ते में देखा था।
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“बहुत... शायद शब्दों में नहीं बता पाऊँगा।”
वह भी मुस्कुरा दी।
“पहाड़ों की खूबसूरती बताई नहीं जाती, बस महसूस की जाती है।”
उसकी यह बात मेरे मन में कहीं रह गई।
हम दोनों कुछ देर चुप रहे।
फिर उसने पूछा—
“आप लोग पहली बार आए हो?”
मैंने कहा—
“हाँ, और शायद पहली बार किसी जगह से इतनी जल्दी प्यार हुआ है।”
वह हँस दी।
मैं भी मुस्कुरा दिया।
कुछ मुलाकातें बहुत छोटी होती हैं, लेकिन पता नहीं क्यों उनकी याद बहुत लंबी हो जाती है।
शिवम दूर से हमें देख रहा था। उसने सौरभ के कान में कुछ कहा और दोनों हँसने लगे।
मैंने उन्हें घूरकर देखा तो शिवम चिल्लाया—
“अरे भाई, पहाड़ देखने आए थे... पहाड़न देखने नहीं!”
सब हँसने लगे और मैं शर्माकर दूसरी तरफ देखने लगा।
रात होने लगी थी।
हमने बाबा को चाय के पैसे दिए वो
कहने लगे—
“पहाड़ पर आए हो बेटा, याद लेकर जाना है।”
उनकी बात सुनकर हम कुछ पल चुप रहे।
फिर हमने बाबा के साथ एक फोटो ली और आगे बढ़ गए।
रास्ते में शिवम फिर शुरू हो गया—
“तो भाई, दस दिन का सफर है... पहले दिन ही कोई मिल गई?”
मैंने कहा—
“कुछ भी बोलता है तू।”
सौरभ हँसते हुए बोला—
“भाई, पहाड़ पर चाय तो पी ली... अब कहानी आगे बढ़ेगी।”
हम सब हँसते हुए आगे बढ़ते रहे।
उस रात हम एक छोटे-से पहाड़ी घर में रुके। बाहर ठंडी हवा चल रही थी और आसमान में इतने तारे थे जितने शायद मैंने शहर में कभी देखे ही नहीं थे।
सब दोस्त बातें करते-करते सो गए।
लेकिन मैं काफी देर तक खिड़की के पास बैठा रहा।
मेरे हाथ में वही पहाड़ी चाय का आखिरी कप था।जो इस बार मैंने खुद बनाई थी
मैं सोच रहा था कि हम यहाँ सिर्फ दस दिन की छुट्टी बिताने आए थे।
लेकिन उस सफर ने पहले ही दिन मुझे कुछ सिखा दिया था—
जिंदगी हमेशा बड़ी खुशियों से खूबसूरत नहीं होती। कभी-कभी दोस्तों के साथ एक अनजान रास्ता, पहाड़ों के बीच एक छोटी-सी दुकान और हाथ में चाय का कप ही काफी होता है।
और शायद प्यार भी कुछ ऐसा ही है।
वो हमेशा किसी बड़ी कहानी के साथ नहीं आता।
कभी-कभी वो बस एक अनजान रास्ते पर हुई छोटी-सी मुलाकात, एक हल्की-सी मुस्कान और कुछ अधूरे शब्दों के रूप में जिंदगी में आ जाता है।
मैंने खिड़की से बाहर देखा।
दूर पहाड़ चाँदनी में बिल्कुल शांत खड़े थे।
मैं मुस्कुराया और मन ही मन कहा—
“हम तो पहाड़ों पर चाय पीने आए थे... लेकिन लगता है ये सफर हमारे दिल में कुछ और भी छोड़ जाएगा।”
फिर मैंने चाय का आखिरी घूंट लिया, खिड़की बंद की और सोने चला गया।सफर खत्म हो चुका था... लेकिन शायद एक नई कहानी शुरू हो गई थी।
जो लखनऊ में भी मुझे याद थी वो एक बात
"सुन्दर है ना........
— समाप्त — ☕🏔️❤️
मुसाफिर रिशु
Musafir rishu
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