कोहरे के उस पार
सर्दियों में हमारे शहर की सुबह कुछ ऐसी होती थी जैसे किसी ने रात और दिन के बीच सफेद चादर टाँग दी हो।
दस कदम आगे का आदमी दिखाई नहीं देता था, लेकिन मोहल्ले की हर आंटी को यह पता रहता था कि शर्मा जी की बेटी कल रात कितने बजे घर आई थी।
कोहरा जितना घना था, खबरें उतनी ही साफ।
उस सुबह भी मैं छत पर खड़ा नीचे सड़क को देख रहा था।
सामने वाली चाय की दुकान से आवाज आई—
“भइया, चाय ले जाओ… ठंडी हो गई तो फिर गरम करने के पैसे लगेंगे!”
मैं नीचे उतर आया।
चाय वाले श्यामलाल की दुकान हमारे मोहल्ले की संसद थी।
वहाँ चाय कम और फैसले ज्यादा बनते थे।
किसकी नौकरी लगी, किसकी शादी होने वाली है, किसके लड़के ने बाइक खरीदी और किसकी लड़की फोन पर ज्यादा बात करती है—इन सबका जवाब श्यामलाल के पास था।
मैंने चाय उठाई।
तभी पीछे से आवाज आई—
“तुम अभी तक यहीं हो?”
मैंने पलटकर देखा।
मीरा।
गले में ऊनी दुपट्टा, हाथ में किताबें और चेहरे पर वही जल्दी में रहने वाली परेशानी।
“कहाँ जाऊँ?” मैंने पूछा।
“कहीं भी चले जाओ। रास्ता तो वैसे भी दिखाई नहीं दे रहा।”
“तो तुम क्यों आई हो?”
“कॉलेज जाना है।”
“इतने कोहरे में?”
“पढ़ने।”
मैंने चाय की चुस्की ली।
“तुम्हें देखकर तो नहीं लगता।”
वह मेरी तरफ घूरकर देखने लगी।
“तुम्हें देखकर तो लगता है कि बेरोजगारी ने तुम्हें दार्शनिक बना दिया है।”
श्यामलाल हँस पड़ा।
“बिटिया ठीक कह रही है।”
मैंने दोनों को देखा।
“एक दिन मेरी इज्जत जरूर होगी इस शहर में।”
मीरा बोली—
“उस दिन हमें पहचानना मत भूलना।”
मैंने कहा—
“तुम्हें कैसे भूलूँगा?”
वह एक पल को चुप हुई।
फिर बोली—
“अच्छा, रास्ता छोड़ो।”
वह कोहरे में आगे बढ़ गई।
मैं उसे तब तक देखता रहा जब तक वह दिखाई देना बंद नहीं हो गई।
अजीब बात थी।
उस सुबह कोहरा बहुत था।
लेकिन उसके जाने के बाद सड़क मुझे पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रही थी।
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मीरा मेरे पड़ोस में पिछले दो साल से रह रही थी।
उसके पिता डाकघर में थे और माँ घर पर सिलाई करती थीं।
मीरा पढ़ने में अच्छी थी।
मैं पढ़ने में ठीक था।
बस फर्क इतना था कि वह किताब खोलती थी तो पढ़ती थी और मैं किताब खोलकर पहले दस मिनट सोचता था कि जिंदगी में आखिर करना क्या है।
हमारी दोस्ती भी किसी कहानी की तरह नहीं हुई थी।
एक दिन उसने मेरे दरवाजे पर आकर पूछा—
“आपके पास पिछले साल के गणित के नोट्स हैं?”
मैंने कहा—
“हैं।”
“दे देंगे?”
“हाँ।”
“कब?”
“जब मुझे मिल जाएँगे।”
वह मुझे पाँच सेकंड तक देखती रही।
“आपने रखे कहाँ हैं?”
मैंने बहुत गंभीर होकर कहा—
“यही तो समस्या है।”
उस दिन से वह मेरे कमरे में आती रही।
नोट्स लेने।
किताब लेने।
कभी पेन लेने।
और धीरे-धीरे बिना कुछ लिए भी।
मुझे बाद में समझ आया कि कुछ लोग जिंदगी में किसी काम से नहीं आते।
वे बस रहने लगते हैं।
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मीरा का सपना था कि वह शिक्षक बने।
मेरा सपना हर छह महीने में बदलता था।
कभी सरकारी नौकरी।
कभी शहर में अपना काम।
कभी किसी कंपनी में बड़ी नौकरी।
और कभी लगता था कि गाँव लौटकर खेती ही कर लूँ।
माँ कहती थीं—
“पहले एक सपना पकड़ ले, फिर उसके पीछे भागना।”
मैं कहता—
“माँ, सपना पकड़ने से पहले पता तो चले सपना है क्या।”
माँ सिर पकड़ लेतीं।
मीरा मेरी बात सुनकर हँसती थी।
“तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या पता है क्या?”
“क्या?”
“तुम्हें हर रास्ता अच्छा लगता है, इसलिए कहीं पहुँचते नहीं।”
उस समय मुझे उसकी बात बुरी लगती थी।
आज लगता है, वह सही थी।
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एक जनवरी की सुबह मीरा ने कहा—
“मैं जा रही हूँ।”
“कहाँ?”
“लखनऊ।”
“क्यों?”
“बी.एड. की तैयारी के लिए कोचिंग है।”
मैं चुप हो गया।
“कब?”
“अगले हफ्ते।”
“कितने दिनों के लिए?”
“शायद एक साल।”
मैंने हँसने की कोशिश की।
“एक साल में तो तुम हमें भूल जाओगी।”
उसने कहा—
“तुम्हें भूलना आसान नहीं है।”
मैं मुस्कराया।
फिर उसने तुरंत जोड़ा—
“इतना परेशान आदमी रोज कहाँ मिलेगा?”
मैंने राहत की साँस ली।
“मुझे लगा कुछ अच्छा बोलोगी।”
“बोला तो।”
उस शाम हम दोनों उसी चाय की दुकान पर बैठे थे।
श्यामलाल ने चाय रखते हुए पूछा—
“बिटिया, जा रही हो?”
“हाँ काका।”
“लखनऊ?”
“हाँ।”
उन्होंने मेरी तरफ देखा।
“और तू?”
“मैं?”
“तू कहाँ जाएगा?”
मैंने चाय पीते हुए कहा—
“मैं यहीं रहूँगा।”
श्यामलाल मुस्कराए।
“कुछ लोग जगह नहीं छोड़ते बेटा, बस समय उन्हें पीछे छोड़ जाता है।”
उस वक्त मुझे यह बात समझ नहीं आई।
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मीरा चली गई।
पहले महीने रोज बात हुई।
दूसरे महीने एक दिन छोड़कर।
तीसरे महीने सिर्फ रविवार।
फिर कभी-कभी।
जिंदगी में दूरी अचानक नहीं आती।
वह पहले बातों के बीच आती है।
फिर जवाबों में।
फिर इंतजार में।
और एक दिन पता चलता है कि सामने वाला बहुत दूर चला गया है, जबकि उसने कहीं जाने की घोषणा भी नहीं की।
मीरा पढ़ाई में लग गई।
मैंने भी नौकरी की तैयारी शुरू कर दी।
मगर मेरे पास एक समस्या थी।
मैं पढ़ाई करने बैठता तो पाँच मिनट बाद फोन उठाकर देखता कि मीरा का संदेश आया या नहीं।
एक दिन उसने लिखा—
“तुम अपनी जिंदगी के साथ मजाक कर रहे हो।”
मैंने जवाब दिया—
“तुम्हारे बिना जिंदगी वैसे भी मजाक ही है।”
उसका जवाब नहीं आया।
दो घंटे बाद आया—
“बड़े हो जाओ।”
मैं हँसा।
लेकिन उस छोटे-से जवाब में मुझे पहली बार लगा कि शायद वह मुझसे कुछ ज्यादा चाहती थी।
या शायद मैं ही देर से समझ रहा था।
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एक साल बाद मैं लखनऊ गया।
नौकरी का इंटरव्यू था।
इंटरव्यू खराब हुआ।
इतना खराब कि बाहर निकलते समय मुझे खुद पर दया आ गई।
मैंने मीरा को फोन किया।
“फेल हो गया।”
उसने पूछा—
“क्या?”
“इंटरव्यू।”
“अच्छा।”
“बस?”
“और क्या कहूँ?”
“थोड़ा दुखी हो जाओ।”
वह हँस पड़ी।
“तुम्हारा इंटरव्यू था, मेरी मौत थोड़ी हुई है।”
मैं भी हँस पड़ा।
फिर उसने कहा—
“शाम को मिलोगे?”
“कहाँ?”
उसने एक पता बताया।
मैं वहाँ पहुँचा।
वह एक छोटे-से पुस्तकालय के बाहर खड़ी थी।
मैंने उसे देखते ही कहा—
“तुम बदल गई हो।”
“कैसे?”
“पहले चोटी करती थीं।”
“अब बाल छोटे हैं।”
“नहीं।”
“तो?”
“पहले तुम्हें देखकर मैं कुछ बोल नहीं पाता था। अब भी नहीं पा रहा।”
वह हँसने लगी।
“तुम बिल्कुल नहीं बदले।”
हम पास के पार्क में बैठ गए।
बहुत देर तक बातें होती रहीं।
उसने बताया कि उसे स्कूल में अस्थायी नौकरी मिल गई है।
मैंने बताया कि घर की हालत ठीक नहीं चल रही।
पिताजी की तबीयत खराब रहती थी।
माँ की दवाइयाँ बढ़ गई थीं।
बहन की शादी करनी थी।
मीरा चुपचाप सुनती रही।
फिर उसने पूछा—
“तुम मेरे साथ चलोगे?”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“कहाँ?”
“लखनऊ।”
“क्यों?”
“वहाँ स्कूल में एक और आदमी की जरूरत है। तुम्हारे लिए बात कर सकती हूँ।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“डरो मत,” उसने कहा।
मैं हँसा।
“मैं डर नहीं रहा।”
“फिर?”
“सोच रहा हूँ।”
वह बोली—
“तुम हमेशा सोचते रहते हो।”
मैंने पहली बार उसकी आँखों में देखकर कहा—
“क्योंकि हर फैसला सिर्फ मेरा नहीं होता।”
वह चुप हो गई।
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मैं लखनऊ नहीं गया।
पिताजी की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी।
कुछ महीने अस्पताल और घर के बीच निकल गए।
फिर उनकी मृत्यु हो गई।
उस दिन के बाद जिंदगी का मतलब मेरे लिए कुछ समय के लिए बदल गया।
घर में उनकी कुर्सी खाली रहती थी।
माँ चुपचाप खाना बनाती थीं।
बहन की शादी की चिंता सामने थी।
और मैं पहली बार सचमुच बड़ा हो गया था।
मीरा ने कई बार फोन किया।
मैंने नहीं उठाया।
उसने संदेश भेजे।
मैंने जवाब नहीं दिया।
मुझे लगता था, मैं उसे अपने दुख में क्यों घसीटूँ?
लेकिन आदमी जब दुख में होता है तो अक्सर यही गलती करता है—
जिसे सबसे ज्यादा अपने पास होना चाहिए, उसी से सबसे ज्यादा दूर चला जाता है।
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करीब आठ महीने बाद एक दिन डाकिया घर आया।
मेरे नाम एक पत्र था।
लिफाफे पर मीरा की लिखावट थी।
मैंने उसे खोला।
अंदर सिर्फ एक पन्ना था।
उसने लिखा था—
“तुम्हारे पिता के बारे में पता चला। देर से पता चला। माफ करना। तुमने मुझे अपने दुख में शामिल नहीं किया, इसका दुख ज्यादा है। आदमी अकेले दुख सहकर मजबूत नहीं होता। बस आदत डाल लेता है।”
नीचे एक और पंक्ति थी—
“और हाँ, मैं अगले महीने अपने शहर आ रही हूँ। अगर तुम फिर भागे, तो इस बार मैं तुम्हारे घर आ जाऊँगी।”
मैं पहली बार रोया।
शायद पिता के जाने पर भी उतना नहीं रोया था।
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वह अगले महीने आई।
उसी जनवरी में।
सुबह फिर कोहरा था।
मैं चाय की दुकान पर बैठा था।
श्यामलाल बूढ़े हो गए थे।
मैंने पूछा—
“काका, आज धूप निकलेगी?”
उन्होंने कहा—
“धूप को आने में देर हो सकती है, बेटा। लौटना बंद नहीं करती।”
तभी पीछे से आवाज आई—
“तुम अभी तक यहीं हो?”
मैंने पलटकर देखा।
मीरा।
हाथ में वही किताबें।
बस इस बार आँखों में पहले से ज्यादा ठहराव था।
मैं हँसा।
“कहाँ जाता?”
वह मेरे सामने बैठ गई।
श्यामलाल ने बिना पूछे दो चाय बना दीं।
मीरा ने कप उठाया।
“अब क्या कर रहे हो?”
“पता नहीं।”
“फिर से?”
“हाँ।”
वह मुस्कराई।
“इस बार एक काम करो।”
“क्या?”
“जो सामने है, वही करो।”
“मतलब?”
“घर संभालो। माँ को संभालो। बहन की शादी करो। फिर अपने लिए सोचो।”
मैं उसे देखता रहा।
“और तुम?”
“मैं?”
“तुम कहाँ रहोगी?”
उसने चाय में फूँक मारते हुए कहा—
“यहीं।”
“हमेशा?”
वह मेरी तरफ देखने लगी।
“पता नहीं।”
मैंने पूछा—
“तुम्हें भी हर चीज का जवाब नहीं पता?”
वह हँस पड़ी।
“नहीं। मैं भी इंसान हूँ।”
दोनों हँसने लगे।
सड़क पर कोहरा अब थोड़ा कम हो रहा था।
सामने से सूरज की हल्की रोशनी दिखाई देने लगी।
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उस दिन हम कोई बड़ा फैसला लेकर नहीं उठे।
न मैंने उससे प्रेम का इजहार किया।
न उसने कोई वादा किया।
हम बस साथ-साथ घर की तरफ चल पड़े।
रास्ते में उसने पूछा—
“तुम्हारी माँ अब भी सुबह तुलसी में पानी देती हैं?”
“हाँ।”
“और तुम्हारी बहन?”
“उसकी शादी अगले महीने है।”
“अच्छा।”
“तुम आओगी?”
वह मेरी तरफ देखकर बोली—
“नहीं आई तो तुम्हारी माँ मुझे घर से निकाल देंगी।”
मैं हँसा।
“माँ तुम्हें कभी नहीं निकालेंगी।”
“इतना भरोसा?”
“हाँ।”
“क्यों?”
मैंने कहा—
“क्योंकि उन्हें पता है, तुम्हारे आने के बाद मैं पहली बार जिंदगी को लेकर गंभीर हुआ हूँ।”
वह कुछ नहीं बोली।
बस चलते-चलते अपना दुपट्टा ठीक करने लगी।
उसकी आँखों में शायद मुस्कान थी।
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कई साल बाद भी मुझे वह जनवरी याद है।
न इसलिए कि उस दिन कोई प्रेम कहानी पूरी हुई थी।
बल्कि इसलिए कि उस दिन मैंने जाना—
जिंदगी हमेशा साफ रास्ता दिखाकर आगे नहीं बढ़ाती।
कभी-कभी वह पहले चारों तरफ कोहरा करती है।
आपको कुछ दिखाई नहीं देता।
आप डरते हैं कि कहीं गलत दिशा में तो नहीं जा रहे।
फिर कोई अपना पास आकर बस इतना कह देता है—
“चलो, धीरे-धीरे चलते हैं। रास्ता दिखाई न भी दे, तो क्या हुआ।”
बाकी जिंदगी वहीं से आसान नहीं होती।
माँ फिर भी बीमार पड़ती हैं।
पैसे फिर भी कम पड़ते हैं।
नौकरी के लिए फिर इंटरव्यू देने पड़ते हैं।
कभी घर में झगड़ा होता है, कभी अपने ही फैसलों पर शक।
लेकिन फर्क इतना आता है कि आदमी अकेला नहीं रहता।
और शायद यही प्रेम का सबसे सुंदर रूप है।
किसी का हाथ पकड़कर सारी परेशानियाँ खत्म कर देना नहीं।
बल्कि परेशानियों के बीच खड़े होकर कहना—
“डरो मत, मैं हूँ।”
उस दिन कोहरे के उस पार कोई बहुत बड़ी मंजिल नहीं थी।
बस एक छोटा-सा घर था।
माँ की आवाज थी।
चूल्हे पर चढ़ी चाय थी।
बहन की शादी की तैयारियाँ थीं।
और मेरे साथ चलती हुई मीरा थी।
सूरज अब पूरी तरह निकल आया था।
मैंने पीछे मुड़कर उस सड़क को देखा।
जहाँ कुछ देर पहले तक कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।
मुझे लगा—
शायद जिंदगी भी ऐसी ही है।
हमें हमेशा पूरा रास्ता दिखाई देने की जरूरत नहीं होती।
कभी-कभी बस इतना काफी है कि कोहरे के उस पार कोई अपना हमारा इंतजार कर रहा हो।
और तब समझ आता है—
रास्ते कभी सच में खोते नहीं हैं।
बस कुछ देर के लिए कोहरे में छिप जाते हैं।

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