जिसे मैंने खोया ही नहीं
जिसे मैंने खोया ही नहीं
उसका नंबर मैंने कभी डिलीट नहीं किया।
पाँच साल हो गए थे।
न बात हुई, न मुलाकात। कभी-कभी व्हाट्सऐप पर उसकी तस्वीर बदलती दिखाई दे जाती थी, बस इतना ही।
फिर भी उसका नाम मेरी कॉन्टैक्ट लिस्ट में वैसे ही पड़ा था—
“नैना”
न कोई सरनेम, न कोई इमोजी।
सिर्फ नैना।
शायद इसलिए कि कुछ लोगों को नाम के साथ किसी पहचान की जरूरत नहीं होती।
वे जितने हमारे होते हैं, उतने ही हमारे भीतर भी रहते हैं।
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उस शाम मैं ऑफिस से लौटकर कमरे में आया तो बाहर बारिश हो रही थी।
कमरा वही था—छोटा-सा, किराए का।
एक मेज, दो कुर्सियाँ, किताबों का बिखरा ढेर और खिड़की के पास रखा मनी प्लांट, जिसे मैं पिछले आठ महीने से बचाने की कोशिश कर रहा था।
फोन चार्ज पर लगाया और कपड़े बदलकर खिड़की के पास बैठ गया।
बारिश देखते हुए न जाने क्यों पुरानी बातें याद आने लगीं।
शायद बारिश का यही दोष है।
वह बाहर कम और भीतर ज्यादा बरसती है।
मैंने फोन उठाया।
पता नहीं क्यों, नैना का नंबर खोल लिया।
आखिरी चैट पाँच साल पुरानी थी।
उसमें मेरी तरफ से एक संदेश था—
“घर पहुँचकर बता देना।”
उसका जवाब था—
“हाँ।”
बस।
इतनी-सी बातचीत।
और उसके बाद पाँच साल की चुप्पी।
मैंने स्क्रीन बंद कर दी।
कुछ देर बाद फिर फोन उठाया।
इस बार मैंने नंबर पर उंगली रखी।
कॉल करने का मन हुआ।
फिर नहीं किया।
कुछ रिश्तों में सबसे बड़ी मुश्किल यही होती है कि आपको पता नहीं होता—
बात शुरू कहाँ से करें?
“कैसी हो?”
बहुत छोटा सवाल था।
लेकिन उसके पीछे पाँच साल खड़े थे।
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नैना से मेरी मुलाकात कॉलेज के पहले साल में हुई थी।
वह कोई ऐसी लड़की नहीं थी जिसे देखते ही पूरी दुनिया रुक जाए।
वह बस उन लोगों में से थी जिनके साथ बैठकर दुनिया थोड़ी कम शोर वाली लगती है।
हमारी दोस्ती भी किसी फिल्म की तरह शुरू नहीं हुई थी।
एक दिन लाइब्रेरी में मेरी किताब उसके पास चली गई थी।
“ये आपकी है?”
उसने किताब उठाकर पूछा।
“हाँ।”
“आपने इसमें कुछ पढ़ा भी है?”
मैंने किताब वापस लेते हुए कहा—
“नहीं।”
वह हँस पड़ी।
“फिर?”
“किताब पास रखने से पढ़ाई हुई हुई लगती है।”
उस दिन से बात शुरू हुई।
फिर चाय।
फिर कैंटीन।
फिर कॉलेज की सीढ़ियाँ।
फिर रोज का इंतजार।
और फिर एक समय ऐसा आया जब हम दोनों को यह बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी कि हम एक-दूसरे के लिए क्या हैं।
हम कुछ थे।
लेकिन क्या थे—
यह कभी तय नहीं किया।
शायद दोस्त।
शायद उससे थोड़ा ज्यादा।
या शायद दो ऐसे लोग, जिन्हें एक-दूसरे की आदत हो गई थी।
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आखिरी साल में नैना को दिल्ली में नौकरी मिल गई।
मुझे लखनऊ में।
उसने जाते समय कहा था—
“दूर रहोगे तो भूल जाओगे।”
मैंने हँसकर कहा—
“तुम्हें भूलना इतना आसान है क्या?”
उसने जवाब नहीं दिया।
बस मुस्करा दी।
फिर स्टेशन पर ट्रेन चलने लगी।
वह दरवाजे के पास खड़ी थी।
मैं प्लेटफॉर्म पर।
उसने हाथ हिलाया।
मैंने भी।
उस दिन मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि अगली बार उसे देखने में पाँच साल लग जाएंगे।
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पहले कुछ महीने बात होती रही।
फिर कम।
फिर और कम।
एक दिन उसने कहा—
“घर वाले शादी की बात कर रहे हैं।”
मैंने पूछा—
“तुम क्या चाहती हो?”
उसने कहा—
“पता नहीं।”
मैंने कहा—
“अगर पता चले तो बताना।”
वह चुप रही।
मैंने भी।
कभी-कभी जिंदगी में सबसे बड़ी गलती कोई गलत बात कह देना नहीं होती।
सही बात कहने से डर जाना होती है।
मैं उस दिन कह सकता था—
“नैना, मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ।”
लेकिन मैंने नहीं कहा।
मुझे नौकरी का भरोसा नहीं था।
पैसों का नहीं।
घरवालों का नहीं।
खुद का भी नहीं।
मैंने सोचा—
पहले सब ठीक कर लूँगा।
फिर बात करूँगा।
लेकिन जिंदगी में “पहले” नाम की कोई मंजिल नहीं होती।
एक समस्या खत्म होती है तो दूसरी सामने खड़ी मिलती है।
और हम इंतजार करते रहते हैं कि एक दिन सब ठीक होगा।
वह दिन कभी नहीं आया।
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दो साल बाद मुझे पता चला कि नैना की शादी हो गई।
किसी दोस्त ने बताया था।
मैंने सिर्फ इतना कहा—
“अच्छा।”
उस रात मैंने बहुत देर तक छत देखी थी।
रोया नहीं था।
शायद रोने के लिए भी किसी उम्मीद का बचा होना जरूरी होता है।
मेरी उम्मीद उस दिन चुपचाप कहीं बैठ गई थी।
लेकिन अजीब बात यह थी कि नैना चली गई, फिर भी मेरी जिंदगी से गई नहीं।
जब भी चाय बनाता, कप अपने आप दो रखने का मन करता।
किसी दुकान में नीली स्याही का पेन दिखता तो उसकी याद आती।
सर्दियों में धूप में बैठता तो याद आता कि वह हमेशा कहती थी—
“धूप में बैठकर बातें ज्यादा अच्छी लगती हैं।”
मैंने कभी उसे वापस पाने की कोशिश नहीं की।
न कोई संदेश।
न कोई शिकायत।
न कोई सवाल।
बस उसकी जगह अपनी जिंदगी में वैसी ही रहने दी।
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पाँच साल बाद एक रविवार मैं पुराने कॉलेज गया।
एक दोस्त की शादी थी।
शादी खत्म होने के बाद शाम को मैं अकेला कॉलेज की तरफ निकल गया।
गेट वही था।
कैंटीन वही थी।
बस चेहरे बदल गए थे।
मैं उसी सीढ़ी पर जाकर बैठ गया जहाँ कभी हम दोनों बैठते थे।
काफी देर तक कुछ नहीं किया।
बस बैठा रहा।
तभी पीछे से किसी ने पूछा—
“यहाँ अभी भी किताबें नहीं पढ़ते?”
मैंने पलटकर देखा।
नैना।
कुछ पल के लिए मुझे लगा कि मैं उसे देख नहीं रहा, याद कर रहा हूँ।
वह पहले से थोड़ी बदल गई थी।
चेहरे पर पहले से ज्यादा ठहराव था।
आँखों के नीचे हल्की थकान।
हाथ में एक छोटा-सा बैग।
और वही मुस्कान।
“तुम?” मेरे मुँह से निकला।
“हाँ।”
“यहाँ कैसे?”
“एक काम था।”
“अच्छा।”
फिर चुप्पी।
पाँच साल की चुप्पी शायद इतनी बड़ी होती है कि उसके सामने शब्द छोटे पड़ जाते हैं।
वह मेरे पास बैठ गई।
कुछ देर बाद उसने पूछा—
“तुमने शादी नहीं की?”
मैंने हँसते हुए कहा—
“नहीं।”
“क्यों?”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“पता नहीं।”
उसने नजरें झुका लीं।
फिर बोली—
“मैंने भी नहीं।”
मैं चौंका।
“लेकिन…”
“हाँ,” उसने बीच में ही कहा, “सबको लगा थी हो गई।”
मैं कुछ नहीं बोला।
“मेरी सगाई हुई थी,” उसने कहा, “शादी नहीं।”
“क्यों?”
वह कुछ देर चुप रही।
फिर बोली—
“क्योंकि जिस आदमी के साथ जिंदगी बितानी थी, उससे शादी से पहले एक सवाल पूछा था।”
“क्या?”
“क्या तुम मेरे साथ तब भी रहोगे, जब मैं खुश न रहूँ?”
मैं उसकी तरफ देखने लगा।
“उसने कहा—‘मैं तुम्हें खुश रखूँगा।’”
वह हल्का-सा मुस्कराई।
“मुझे जवाब चाहिए था। उसने वादा दे दिया।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
वह आगे बोली—
“सगाई टूट गई।”
हवा में पेड़ों की आवाज थी।
मैंने पूछा—
“फिर मुझसे बात क्यों नहीं की?”
उसने मेरी तरफ देखा।
“तुमने भी तो नहीं की।”
मैं मुस्करा दिया।
“मुझे लगा तुम्हारी जिंदगी आगे बढ़ गई।”
“मुझे लगा तुमने मुझे पीछे छोड़ दिया।”
हम दोनों हँस पड़े।
बहुत हल्की-सी हँसी थी।
लेकिन उसके भीतर पाँच साल का बोझ था।
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चलते समय नैना ने पूछा—
“एक बात पूछूँ?”
“हाँ।”
“तुमने मेरा नंबर अब तक क्यों रखा?”
मैंने फोन निकाला।
उसका नाम दिखाया।
“पता नहीं।”
वह बोली—
“झूठ।”
मैंने पहली बार सच कहा।
“शायद इसलिए कि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता था।”
वह चुप रही।
फिर बोली—
“लेकिन हम तो पाँच साल से अलग थे।”
मैंने फोन जेब में रख लिया।
“अलग होना और खो देना एक बात नहीं है, नैना।”
वह मेरी तरफ देखने लगी।
मैंने कहा—
“तुम मेरी जिंदगी में नहीं थीं, लेकिन मेरी जिंदगी से कभी गई भी नहीं।”
उसकी आँखों में हल्की नमी आ गई।
उसने तुरंत चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
“तुम अब भी बातें अच्छी करते हो।”
मैं हँसा।
“तुम अब भी बात बदल देती हो।”
कुछ देर हम सड़क पर साथ चलते रहे।
फिर वह एक मोड़ पर रुक गई।
“मैं चलूँ?”
“हाँ।”
“फिर मिलोगे?”
इस बार मैंने बिना सोचे कहा—
“हाँ।”
वह चली गई।
मैं वहीं खड़ा रहा।
पहले की तरह उसे जाते हुए देखता रहा।
बस इस बार मुझे पता था—
वह जा रही है।
लेकिन कहीं खो नहीं रही।
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उस रात घर आकर मैंने पहली बार उसका नंबर डिलीट नहीं किया।
बल्कि उसके नाम के आगे कुछ भी नहीं लिखा।
न “पुरानी दोस्त”।
न “जरूरी इंसान”।
न कोई दिल।
कुछ रिश्तों को नाम देकर छोटा कर देना मुझे अब अच्छा नहीं लगता था।
मैंने फोन मेज पर रखा और खिड़की खोल दी।
बाहर हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी।
अचानक फोन बजा।
नैना का संदेश था—
“घर पहुँच गई।”
मैं देर तक उस चार शब्दों को देखता रहा।
पाँच साल पहले भी उसका आखिरी संदेश यही था—
“घर पहुँचकर बता देना।”
मैं मुस्करा दिया।
शायद जिंदगी ने उस अधूरी बातचीत को पाँच साल तक संभालकर रखा था।
मैंने जवाब लिखा—
“अच्छा। अबकी बार बात अधूरी मत छोड़ना।”
कुछ देर बाद उसका जवाब आया—
“इस बार नहीं।”
मैंने फोन बंद कर दिया।
उस रात मुझे पहली बार समझ आया—
कुछ लोग हमारी जिंदगी से चले जाते हैं, लेकिन हमारे भीतर से नहीं।
और कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते।
बस थोड़ी देर के लिए चुप हो जाते हैं।
कभी-कभी हम सोचते रहते हैं कि हमने किसी को खो दिया।
फिर बहुत साल बाद पता चलता है—
हमने उसे खोया ही नहीं था।
हमने बस उसे अपनी जिंदगी के एक ऐसे हिस्से में रख दिया था,
जहाँ समय पहुँच नहीं पाता।
— मुसाफिर रिशु

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