Sunday, 6 September 2026

जिसका इंतजार था

 

जिसका इंतज़ार था



“अगर वह आज नहीं आया, तो मैं कभी उसका इंतज़ार नहीं करगी।”

उसने यह बात मुझसे ठीक शाम के पाँच बजकर दस मिनट पर कही थी।

मैंने हँसकर पूछा था—

“और अगर आ गया तो?”

वह कुछ देर चुप रही।

फिर खिड़की के बाहर देखते हुए बोली—

“तो शायद… मैं उससे कुछ नहीं पूछूँगी।”

“क्यों?”

उसने मेरी तरफ देखा।

आँखों में जाने कैसी उदासी थी।

“क्योंकि पाँच साल के इंतज़ार के बाद इंसान सवाल नहीं करता… बस यह देखता है कि सामने वाला सच में आया है या फिर कोई सपना है।”

मैं उसकी बात समझ नहीं पाया था।

लेकिन आज, इतने साल बाद, जब मैं उस शाम को याद करता हूँ, तो लगता है कि कुछ बातें उस वक्त समझ में नहीं आतीं।

उनका मतलब…

बहुत देर बाद खुलता है।


उस दिन स्टेशन पर बहुत भीड़ थी।

दिसंबर की शाम थी। ठंडी हवा प्लेटफॉर्म पर घूम रही थी और चाय बेचने वाले की आवाज बार-बार सुनाई दे रही थी—

“गरम चाय… गरम चाय…”

मैं प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर खड़ा था।

मेरी नजर बार-बार घड़ी पर जा रही थी।

5:10

फिर 5:20।

फिर 5:35।

ट्रेन आने में अब सिर्फ दस मिनट बाकी थे।

मेरे हाथ में एक पुरानी डायरी थी।

उस डायरी के पहले पन्ने पर एक नाम लिखा था—

नैना।

पाँच साल पहले इसी स्टेशन पर मैंने उससे आखिरी बार मुलाकात की थी।

उस दिन भी शाम थी।

उस दिन भी ठंड थी।

और उस दिन भी ट्रेन पाँच नंबर प्लेटफॉर्म से गई थी।

बस फर्क इतना था कि उस दिन जाते हुए नैना ने कहा था—

“मैं वापस आऊँगी।”

और मैंने उस पर विश्वास कर लिया था।


नैना और मैं बचपन से एक-दूसरे को जानते थे।

हमारे घर आमने-सामने नहीं थे, लेकिन इतनी दूरी भी नहीं थी कि एक-दूसरे की खबर न रहे।

वह सुबह छत पर कपड़े सुखाने आती थी।

मैं अक्सर जानबूझकर उसी वक्त किताब लेकर छत पर बैठ जाता।

हमने कभी एक-दूसरे से नहीं कहा था कि हम प्यार करते हैं।

शायद जरूरत ही नहीं पड़ी।

कुछ रिश्ते बोलकर नहीं बनते।

वे रोज की छोटी-छोटी आदतों से बन जाते हैं।

उसका रास्ते में मिलकर मुस्कुरा देना।

मेरा उसके लिए दुकान से उसकी पसंद की टॉफी ले आना।

उसका मेरी परीक्षा के दिन फोन करके कहना—

“घबराना मत।”

और मेरा उसके बीमार होने पर बिना वजह उसके घर के सामने से निकलना।

हम दोनों जानते थे।

लेकिन कहते नहीं थे।


फिर एक दिन उसके पिता ने बताया कि उन्हें शहर जाना होगा।

नैना को आगे पढ़ने के लिए।

वह बहुत खुश थी।

मैं भी खुश था।

लेकिन जाते वक्त स्टेशन पर उसने अचानक पूछा—

“तुम मेरा इंतज़ार करोगे?”

मैंने हँसकर कहा—

“कितने साल?”

वह बोली—

“पता नहीं।”

मैंने कहा—

“तो जितने साल लगें।”

उसने मेरी तरफ देखा।

शायद उस दिन पहली बार उसे विश्वास हुआ था कि कोई सचमुच उसका इंतज़ार कर सकता है।

ट्रेन चली गई।

मैं प्लेटफॉर्म पर खड़ा रहा।

जब तक आखिरी डिब्बा दिखाई देता रहा।


पहले कुछ महीनों तक उसके फोन आते रहे।

फिर कम होने लगे।

फिर बंद हो गए।

मैंने कई बार फोन किया।

नंबर बदल गया था।

उसके घर गया तो पता चला कि वे लोग शहर में ही कहीं और चले गए हैं।

कोई ठीक पता नहीं था।

लोगों ने समझाया—

“जिंदगी में आगे बढ़ जा।”

मैंने भी कोशिश की।

नौकरी की।

घर संभाला।

दोस्तों की शादियाँ देखीं।

कई रिश्ते आए।

हर बार मैंने एक ही बहाना बनाया—

“अभी शादी का मन नहीं है।”

लेकिन असली बात मैं खुद से भी नहीं कहता था।

मैं किसी का इंतज़ार कर रहा था।

मुझे पता भी नहीं था कि वह आएगी या नहीं।

फिर भी…

मैं इंतज़ार कर रहा था।


पाँच साल बाद एक सुबह डाकिया मेरे घर आया।

उसके हाथ में एक छोटा-सा लिफाफा था।

ऊपर मेरा नाम लिखा था।

लिखावट देखते ही मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

नैना।

लिफाफे के अंदर सिर्फ एक पन्ना था।

उस पर लिखा था—

“अगर तुम्हें अब भी मेरी वह बात याद है, तो रविवार शाम पाँच बजे पुराने स्टेशन पर आना। अगर नहीं आओगे, तो मैं समझ जाऊँगी कि तुम्हारी जिंदगी ने मुझे पीछे छोड़ दिया है।”

नीचे सिर्फ एक शब्द था—

नैना।

मैं पूरी रात सो नहीं पाया।

पाँच साल में पहली बार मुझे लगा कि शायद इंतज़ार का कोई अंत होता है।


और अब मैं उसी स्टेशन पर खड़ा था।

5:35 हो चुके थे।

मेरी उम्मीद धीरे-धीरे खत्म होने लगी।

मैंने खुद से कहा—

“शायद वह नहीं आएगी।”

फिर स्टेशन की घड़ी ने छह बजाए।

मैंने डायरी बंद की।

वापस जाने के लिए मुड़ा।

तभी पीछे से आवाज आई—

“तुम अभी भी जल्दी हार मान लेते हो।”

मेरे कदम वहीं रुक गए।

मैंने धीरे-धीरे पलटकर देखा।

वह थी।

नैना।

पाँच साल बाद।

चेहरा वही था।

आँखें वही थीं।

बस उनमें पहले से ज्यादा जिंदगी थी।

और शायद थोड़ा ज्यादा दर्द भी।

मैं कुछ बोल नहीं पाया।

वह मेरे सामने आकर खड़ी हो गई।

फिर मुस्कुराकर बोली—

“पहचाना नहीं?”

मैंने सिर हिलाया।

“तुम्हें भूलना आसान होता तो शायद आज यहाँ नहीं होता।”

उसकी आँखें भर आईं।


हम दोनों स्टेशन के बाहर उसी पुराने चाय वाले के पास बैठ गए।

वही दुकान।

वही कुल्हड़।

बस हम दोनों बदल चुके थे।

मैंने आखिर पूछ ही लिया—

“इतने साल कहाँ थीं?”

उसने चाय की तरफ देखते हुए कहा—

“पिताजी की तबीयत खराब हो गई थी। फिर उनकी नौकरी चली गई। घर चलाने की जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई। मैंने नौकरी की… फिर माँ बीमार हो गईं।”

वह थोड़ी देर चुप रही।

“इन सबके बीच कई बार तुम्हें फोन करने का सोचा।”

“फिर किया क्यों नहीं?”

उसने मेरी तरफ देखा।

“क्योंकि हर बार लगा कि मैं तुम्हें सिर्फ अपनी परेशानियों में बुलाऊँगी।”

मैं चुप रहा।

वह बोली—

“मैं चाहती थी कि जब तुम्हारे पास लौटूँ तो खाली हाथ न लौटूँ। कम से कम अपने पैरों पर खड़ी होकर लौटूँ।”

मैंने धीरे से पूछा—

“और आज?”

उसने पहली बार मेरी आँखों में सीधे देखा।

“आज मेरे पास बहुत कुछ नहीं है।”

फिर हल्की-सी मुस्कान आई।

“लेकिन अब डर नहीं है।”


मैंने पूछा—

“अगर मैं तुम्हारा इंतज़ार नहीं कर रहा होता तो?”

उसने बिना सोचे जवाब दिया—

“तो मैं तुम्हें ढूँढती।”

मैं मुस्कुरा दिया।

“इतना भरोसा था?”

उसने सिर हिलाया।

“तुम पर नहीं…”

मैं चौंका।

वह बोली—

“अपने प्यार पर था।”

उस एक वाक्य ने मेरे भीतर पाँच साल से जमा सारी शिकायतें जैसे पिघला दीं।

मैंने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

कुछ पल वह हाथ को देखती रही।

फिर अपना हाथ मेरी हथेली पर रख दिया।

उसकी हथेली ठंडी थी।

बिल्कुल वैसी ही, जैसी पाँच साल पहले स्टेशन पर थी।

मैंने पूछा—

“अब फिर जाना तो नहीं है?”

उसने मेरी तरफ देखा।

“नहीं।”

“पक्का?”

वह मुस्कुराई।

“इस बार मैं इंतज़ार करवाने नहीं आई।”


कुछ महीने बाद हमने शादी कर ली।

बहुत साधारण-सी शादी थी।

न बड़े होटल।

न बड़ी गाड़ियाँ।

न कोई दिखावा।

बस घर के आँगन में कुछ कुर्सियाँ, रिश्तेदारों की आवाजें और माँ की आँखों में खुशी के आँसू।

शादी के बाद एक दिन नैना ने मेरी पुरानी डायरी खोली।

उसने पहले पन्ने पर अपना नाम देखा।

फिर आखिरी पन्ना खोला।

वहाँ एक तारीख लिखी थी—

“आज पाँच साल पूरे हुए। शायद अब मुझे इंतज़ार छोड़ देना चाहिए।”

नैना बहुत देर तक उस पन्ने को देखती रही।

फिर उसने पेन उठाया और उसी के नीचे लिख दिया—

“इंतज़ार खत्म नहीं हुआ था। बस मैं देर से पहुँची थी।”

मैंने पढ़कर उसकी तरफ देखा।

वह मुस्कुराई।

मैंने कहा—

“पाँच साल बहुत लंबा समय होता है।”

वह मेरे पास आकर बैठ गई।

“लेकिन सही इंसान के लिए…”

मैंने उसकी बात पूरी की—

“शायद उतना भी नहीं।”


आज हमारी शादी को कई साल हो चुके हैं।

हमारे घर में एक छोटी-सी बेटी है, जो रोज शाम दरवाजे पर बैठकर मेरा इंतज़ार करती है।

जब मैं काम से लौटता हूँ तो वह दौड़कर आती है और पूछती है—

“पापा, इतनी देर क्यों कर दी?”

हर बार मैं उसे गोद में उठाकर कहता हूँ—

“रास्ते में थोड़ा काम था।”

और हर बार नैना दूर खड़ी मुस्कुरा देती है।

शायद वह जानती है…

मैंने जिंदगी में सबसे लंबा इंतज़ार उसी का किया था।

लेकिन अब मुझे समझ आया है कि इंतज़ार सिर्फ किसी के लौटने का नाम नहीं है।

कभी-कभी इंतज़ार हमें बदल देता है।

हमें धैर्य सिखाता है।

हमें रिश्तों की कीमत समझाता है।

और सबसे जरूरी—

हमें यह सिखाता है कि हर देर का मतलब बेवफाई नहीं होता।

कभी-कभी सामने वाला भी मजबूरियों के किसी ऐसे रास्ते पर चल रहा होता है…

जिसका पता हमें नहीं होता।

इसलिए अगर आपकी जिंदगी में भी कोई ऐसा इंसान है जिसका आप आज तक इंतज़ार कर रहे हैं…

तो एक बार उससे बात जरूर कर लेना।

हो सकता है वह भी आपकी तरह किसी खिड़की के पास बैठा हो।

हो सकता है उसके पास भी आपकी कोई पुरानी तस्वीर हो।

और हो सकता है…

वह भी यही सोच रहा हो—

“काश, वह एक बार मुझे बुला ले।”

क्योंकि जिंदगी में कुछ लोग किस्मत से नहीं मिलते।

वे बहुत सारे इंतज़ार के बाद मिलते हैं।

और जब मिलते हैं…

तो समझ आता है—

इंतज़ार गलत नहीं था।

बस वक्त थोड़ा लंबा था।


                                       — मुसाफिर रिशु

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